शादीशुदा बेटी होने मात्र से नहीं छीना जा सकता अनुकंपा नौकरी का हक, झारखंड हाईकोर्ट ने 13 साल पुराने मामले में सुनाया ऐतिहासिक फैसला

शादीशुदा बेटी होने मात्र से नहीं छीना जा सकता अनुकंपा नौकरी का हक, झारखंड हाईकोर्ट ने 13 साल पुराने मामले में सुनाया ऐतिहासिक फैसला

भारतीय न्याय व्यवस्था और पारिवारिक अधिकारों के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालने वाला फैसला सामने आया है, जो देश भर की उन लाखों बेटियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है जो अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने के कानूनी संघर्ष से गुजर रही हैं। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट रूप से यह आदेश दिया है कि यदि कोई बेटी शादीशुदा है, तो केवल इस आधार पर उसका अनुकंपा नौकरी (Compassionate Appointment) पर से कानूनी हक नहीं छीना जा सकता। अदालत ने यह कड़ा रुख अपनाते हुए कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (CMPFO) को यह सख्त निर्देश दिया है कि वह दिवंगत कर्मचारी की विवाहिता बेटी को मात्र आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करे। इस ऐतिहासिक फैसले ने रूढ़िवादी और संकीर्ण प्रशासनिक सोच पर एक बड़ा तमाचा जड़ा है, जिसमें यह मान लिया जाता था कि विवाह होने के बाद महिला का अपने मायके और माता-पिता के प्रति आर्थिक या सामाजिक आश्रितता का दायरा समाप्त हो जाता है। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से यह साबित हो गया है कि कानून की नजर में बेटी, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, परिवार की जिम्मेदारी उठाने का बराबर का हक रखती है।

झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख: पति की आय होने से पिता पर निर्भरता खत्म नहीं होती

इस पूरे मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में हुई, जहाँ अदालत ने नियोक्ता संगठन की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें यह कहा गया था कि महिला के पति की अपनी आय है इसलिए उसे पिता पर आश्रित नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि यदि कोई महिला अपने दिवंगत पिता के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के समय उन पर आर्थिक रूप से निर्भर थी, और उसके पास आय का कोई अन्य स्वतंत्र या स्थायी साधन नहीं है, तो केवल उसकी शादी हो जाने भर से उसका अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात का भी संज्ञान लिया कि याचिकाकर्ता महिला अपनी बीमार और असहाय मां के साथ ही रहती है और पूरी तरह से उनकी देखभाल करती है। नियोक्ता संगठन द्वारा पति की मामूली आय को आधार बनाकर निर्भरता समाप्त बताने के तर्क को अदालत ने गलत और अनुचित करार दिया है, जिससे यह संदेश गया है कि प्रशासनिक निकायों को मामलों का निपटारा करते समय मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाना चाहिए।

वर्ष 2013 में हुई थी पिता की मृत्यु, साल 2017 से प्रशासनिक लालफीताशाही में उलझा था मामला

यह पूरा कानूनी संघर्ष तेरह साल पुराना है, जो प्रशासनिक सुस्ती और नियमों के गलत अर्थ निकालने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। झारखंड के धनबाद स्थित कोयला खदान में सहायक (असिस्टेंट) के पद पर कार्यरत अर्जुन प्रसाद का 25 नवंबर 2013 को सेवाकाल के दौरान ही असामयिक निधन हो गया था। पिता की अचानक मृत्यु के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और उनकी विधवा पत्नी ने यह प्रस्ताव दिया कि परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए उनकी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी जाए। हालांकि, कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (CMPFO) के अधिकारियों ने जुलाई 2017 में केवल यह बचकाना और संकीर्ण हवाला देकर उस योग्य बेटी का आवेदन खारिज कर दिया कि वह विवाहित है। इसके बाद न्याय पाने के लिए पीड़ित बेटी ने साल 2023 में झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उसे नए सिरे से आवेदन करने की अनुमति प्रदान की, लेकिन प्रशासनिक अड़ंगेबाजी यहीं नहीं रुकी और अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान संगठन ने फरवरी 2024 में एक बार फिर से उसका दावा खारिज कर दिया। आखिरकार, महिला ने दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जिसके बाद न्याय की जीत हुई।

किडनी दान करने के कारण मां अस्वस्थ, भाइयों ने मोड़ा मुंह तो बेटी ने संभाली परिवार की जिम्मेदारी

इस मामले के मानवीय पहलुओं ने अदालत को भी झकझोर कर रख दिया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता रत्नेश कुमार ने अदालत के समक्ष बेहद मार्मिक और वास्तविक तथ्यों को रखते हुए बताया कि महिला की बुजुर्ग मां किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। इसका मुख्य कारण यह था कि अपनी बीमारी के दिनों में मां ने अपने पति (याचिकाकर्ता के पिता) को बचाने के लिए अपनी एक किडनी दान कर दी थी, जिससे उनका खुद का स्वास्थ्य कमजोर हो गया था। इसके अलावा, परिवार के दोनों बेटों (मृतक के पुत्रों) ने अपनी बीमार मां की जिम्मेदारी उठाने से साफ इनकार कर दिया था और वे परिवार से अलग रहकर अपनी जिंदगी गुजार रहे थे। ऐसी विकट और दयनीय परिस्थिति में पिता की मृत्यु के बाद बुजुर्ग मां की देखभाल का पूरा जिम्मा केवल इसी शादीशुदा बेटी ने उठाया है। वर्तमान में मां और बेटी केवल एक मामूली सी पारिवारिक पेंशन के सहारे किसी तरह अपना जीवन गुजार रही हैं। इसके विपरीत, सीएमपीएफओ की तरफ से पेश अधिवक्ता प्रशांत सिंह ने यह दलील दी थी कि चूंकि पिता की मृत्यु के समय बेटी विवाहित थी, उसका पति कमाता है और उसके भाई भी हैं, इसलिए उसे पूरी तरह आश्रित नहीं माना जा सकता, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक और बड़ा मील का पत्थर

कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने झारखंड हाईकोर्ट के इस फैसले को लैंगिक समानता (Gender Equality) और भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम बताया है। अक्सर देखा जाता है कि सरकारी विभागों या निजी संस्थानों में अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को इस तरह से डिजाइन या व्याख्यायित किया जाता है जो पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि विवाह किसी भी महिला की नागरिक, पारिवारिक और अनुकंपा संबंधी योग्यताओं और अधिकारों को समाप्त नहीं करता है। यदि एक बेटा अपने माता-पिता की देखभाल करने और उनकी नौकरी का हकदार होने की योग्यता रखता है, तो एक बेटी—चाहे उसकी शादी हो चुकी हो—वह भी उतने ही अधिकारों के साथ अपने परिवार का सहारा बन सकती है। कोर्ट के इस स्पष्ट निर्देश के बाद अब सीएमपीएफओ को आठ सप्ताह के भीतर सभी औपचारिकताएं पूरी करते हुए याचिकाकर्ता महिला को नियुक्ति पत्र सौंपना होगा, जिससे न केवल एक असहाय परिवार को स्थायी आर्थिक संबल मिलेगा, बल्कि देश की अन्य बेटियों के लिए भी न्याय का एक मजबूत कानूनी आधार तैयार हो गया है।