स्मृति ईरानी का बड़ा बयान: कांग्रेस गढ़ से लड़ने पर बोलीं, हार के बाद टीवी और संगठन में वापसी

स्मृति ईरानी का बड़ा बयान: कांग्रेस गढ़ से लड़ने पर बोलीं, हार के बाद टीवी और संगठन में वापसी

भारतीय जनता पार्टी की कद्दावर नेता और नवनियुक्त महामंत्री स्मृति ईरानी का एक इंटरव्यू इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोकसभा चुनाव 2024 में अमेठी सीट पर मिली हार के बाद से लगभग दो साल तक मुख्यधारा की राजनीति से दूर रहीं स्मृति ईरानी ने हाल ही में पार्टी संगठन में एक बार फिर धमाकेदार वापसी की है। नितिन नवीन की नई टीम में उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान को दिए गए हालिया साक्षात्कार में उन्होंने अपने राजनीतिक सफर, अमेठी की कठिन चुनावी लड़ाइयों, हार के बाद टीवी इंडस्ट्री की तरफ दोबारा रुख करने और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ अपने रिश्तों पर खुलकर बात की है। उनके इस बेबाक इंटरव्यू ने एक बार फिर से राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, जहां उन्होंने पार्टी के अनुशासन और एक सिपाही के तौर पर अपनी भूमिका को बेहद स्पष्ट तरीके से सामने रखा है।

स्मृति ईरानी से जब यह सवाल पूछा गया कि अमेठी जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर हार मिलने के बाद उन्होंने अचानक मनोरंजन जगत यानी टीवी सीरियलों की ओर दोबारा क्यों रुख किया, तो उन्होंने बेहद सधा हुआ और स्पष्ट जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति को देखने के दो नजरिए होते हैं, कुछ लोग सत्ता और पद के चश्मे से राजनीति को परखते हैं, लेकिन जो कार्यकर्ता विपक्ष का लंबा संघर्ष देख चुके होते हैं, उनके लिए सत्ता से ज्यादा संगठन और वैचारिक निष्ठा मायने रखती है। उन्होंने बताया कि भाजपा के कार्यकर्ता जानते हैं कि विपक्ष में रहकर लंबा वक्त कैसे काटा जाता है और संगठन को किस तरह मजबूत किया जाता है। हार और जीत राजनीति का एक हिस्सा भर हैं, लेकिन इससे किसी भी व्यक्ति की क्षमता या उसके श्रम का मूल्य कम नहीं हो जाता है। उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि एक राजनेता होने के साथ-साथ वह अपनी आजीविका और मेहनत के बल पर आगे बढ़ने में कोई संकोच नहीं रखती हैं।

कांग्रेस के ऐतिहासिक गढ़ और पार्टी के फैसलों पर बेबाक राय

अपने चुनावी करियर के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ और वहां चुनाव लड़ने की चुनौतियों पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी का नेतृत्व उन्हें जहां भी जाने का निर्देश देता है, वह एक अनुशासित सिपाही की तरह बिना किसी संकोच के वहां पहुंच जाती हैं। उन्होंने चुटीले अंदाज में कहा कि कोई मूर्ख ही होगा जो स्वेच्छा से कांग्रेस के इस ऐतिहासिक और पारंपरिक गढ़ से चुनाव लड़ने की सोचेगा, लेकिन जब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और आदेश मिल जाए, तो वह हर चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार रहती हैं। उन्होंने याद किया कि जब उन्हें दो बार राज्यसभा भेजा गया था, तब भी पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व का फोन आया था और ठीक इसी तरह जब लोकसभा चुनाव लड़ने की बात आई, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और रणभूमि में उतर गईं। यह पार्टी के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और अनुशासन का ही प्रमाण है कि उन्होंने कभी भी पार्टी के फैसलों पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि हर जिम्मेदारी को पूरी शिद्दत के साथ निभाया।

चुनाव हारने के बाद मीडिया और टीवी इंडस्ट्री में वापसी के अपने सफर को याद करते हुए स्मृति ईरानी ने एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने दो दशकों तक टेलीविजन इंडस्ट्री में राज किया था, तब उन्होंने इस क्षेत्र का शिखर देखा था और एक ऐसा बेंचमार्क स्थापित किया था जिसे आज भी याद किया जाता है। हार के बाद जब उन्हें लगा कि उन्हें अपनी आजीविका के लिए दोबारा काम करना चाहिए, तो उन्होंने मीडिया दिग्गज उदय शंकर को फोन करके नौकरी के बारे में पूछा। उदय शंकर यह सुनकर पूरी तरह स्तब्ध रह गए कि देश की पूर्व कैबिनेट मंत्री और दिग्गज नेता नौकरी के बारे में बात कर रही हैं। उन्होंने कहा कि पूर्व कैबिनेट मंत्री रह चुकने का यह कतई मतलब नहीं है कि आपकी काम करने की क्षमता खत्म हो चुकी है और अपनी मेहनत से दो वक्त की रोटी कमाने में किसी भी प्रकार की शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए। इसके बाद उदय शंकर ने एकता कपूर से बात की और स्मृति ईरानी की टीवी इंडस्ट्री में एक बार फिर से शानदार वापसी हुई, जहां वह 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' के सीजन 2 में नजर आईं।

अमेठी का सियासी सफर और राजनीतिक भविष्य का नया अध्याय

स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव और संघर्षों की एक ऐसी दास्तान रहा है जिसने भारतीय राजनीति में कई मील के पत्थर स्थापित किए हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जब उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी जैसी सीट से ताल ठोकी थी, तब भले ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर देकर पूरे देश का ध्यान खींच लिया था। इसके बाद साल 2019 के आम चुनावों में उन्होंने अपनी राजनीतिक दृढ़ता का परिचय देते हुए राहुल गांधी को उन्हीं के गढ़ में शिकस्त दी और एक इतिहास रच दिया। हालांकि, साल 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार किशोरी लाल शर्मा के हाथों उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर तमाम तरह की कयासबाजियां लगाई जाने लगीं।

इन तमाम अटकलों और चर्चाओं पर विराम लगाते हुए भाजपा ने उन्हें संगठन में वापस लाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी में उनके अनुभव और सांगठनिक क्षमता का महत्व आज भी उतना ही बड़ा है। महामंत्री के रूप में उनकी यह वापसी न केवल उनके राजनीतिक पुनरुत्थान को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि जमीन से जुड़े नेताओं के लिए संघर्ष का दौर भले ही आए, लेकिन उनका कद कभी छोटा नहीं होता। आज जब वह पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं, तो उनके विरोधी भी उनके इस संघर्षशील और बेबाक रवैये की कायल नजर आते हैं। आने वाले समय में स्मृति ईरानी की यह नई सांगठनिक जिम्मेदारी भाजपा के लिए कितनी फायदेमंद साबित होती है और वह किस प्रकार पार्टी की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाती हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा, लेकिन इतना तय है कि उनकी राजनीतिक कहानी अभी बहुत दूर तक जाने वाली है।