मानसून की सुस्ती और अल नीनो (El Niño) का खतरा: बारिश में 41% की भारी कमी, टमाटर सहित महंगी हो सकती हैं सब्जियां
एक दौर था जब भारत में मानसून के आगमन का मतलब होता था— बारिश के पानी से भरी गलियों में कागज़ की नावें तैराना, गरमा-गरम चाय की प्याली और पकौड़ों का लुत्फ उठाना। अधिकांश भारतीयों के लिए बारिश का मौसम किसी उत्सव से कम नहीं होता था। लेकिन वक्त के साथ यह दौर बदल चुका है। आज मानसून का नाम सुनते ही आम जनता से लेकर सरकार और नीति निर्माताओं (Policy Makers) के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून का देरी से आना या कमजोर पड़ना अब सिर्फ किसानों और खेती-किसानी तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर देश में खाद्य पदार्थों की कीमतों (सब्जियां-राशन), बिजली के बिल, आम आदमी की आय, महंगाई दर (Inflation) और यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नीतिगत फैसलों पर भी पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने बड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' (El Niño) की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है, जो इस साल सूखे जैसे हालात पैदा कर सकती है।
इस साल सामान्य से कम बारिश का अनुमान, 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून!
पिछले एक दशक की बात करें तो भारत लगातार मौसम के बदलते मिजाज और घटती मानसूनी बारिश से जूझता रहा है। इस साल प्री-मानसून सीजन में चली भीषण लू (Heatwave) ने फसलों की पैदावार को पहले ही भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे बिजली ग्रिडों पर लोड बढ़ा है और रोजमर्रा की जिंदगी तनावपूर्ण हुई है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने ताजा पूर्वानुमान में देश के भीतर इस वर्ष महज 90% वर्षा होने का अनुमान लगाया है। यदि यह अनुमान सच साबित होता है, तो देश पिछले तीन वर्षों में पहली बार 'सामान्य से कम' मानसून देखेगा। साथ ही, यह साल 2015 के बाद से अब तक का सबसे कमजोर मानसून सीजन साबित हो सकता है।
आखिर 'अल नीनो' क्या है, जिससे कांप रही है पूरी दुनिया?
वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो (El Niño) एक जटिल वैश्विक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके तहत प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से की सतह का पानी सामान्य के मुकाबले बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है।
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सामान्य स्थिति: आम दिनों में समुद्री हवाएं गर्म पानी को भाप बनाकर पश्चिम की ओर यानी एशिया (भारत सहित) और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं, जिससे हमारे यहाँ अच्छी बारिश होती है।
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अल नीनो की स्थिति: अल नीनो के सक्रिय होने पर ये मौसमी हवाएं पूरी तरह कमजोर हो जाती हैं या अपना रास्ता बदल लेती हैं। इसके कारण गर्म पानी से बनने वाली भाप एशिया की तरफ आने के बजाय पूर्व की ओर (अमेरिका की तरफ) बढ़ जाती है। इससे पूरा वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) बिगड़ जाता है।
अल नीनो का इतिहास: यह चक्र हर 2 से 7 साल में एक बार सक्रिय होता है और लगभग 9 से 12 महीने तक पर्यावरण को प्रभावित करता है। भारत में इसका इतिहास हमेशा से कमजोर मानसून और सूखे से जुड़ा रहा है। साल 1950 के बाद से देश ने कुल 16 अल नीनो वर्ष देखे हैं, जिनमें से 7 वर्षों में देश को भीषण सूखे और बेहद कम बारिश का सामना करना पड़ा था।
महाराष्ट्र में अटका मानसून: सामान्य से 41% कम बरसे बादल
जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन मानसून की रफ्तार बेहद सुस्त बनी हुई है। देश में प्रवेश करने के बाद मानसूनी हवाएं फिलहाल दक्षिण महाराष्ट्र के इलाकों में जाकर अटक गई हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, देश में 4 जून से 18 जून की अवधि के बीच महज 42.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जबकि इस अवधि का सामान्य स्तर 72.2 मिमी होना चाहिए था। यानी देश में सामान्य से 41% कम बारिश हुई है। क्षेत्रवार कमी का आंकड़ा इस प्रकार है:
| क्षेत्र | बारिश में आई गिरावट (%) |
| मध्य भारत | 67% कम बारिश |
| पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भारत | 42% कम बारिश |
| दक्षिण प्रायद्वीप | 22% कम बारिश |
| उत्तर-पश्चिम भारत | 06% कम बारिश |
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अनुमान लगाया है कि जून से अगस्त के बीच अल नीनो के सक्रिय रहने की संभावना 80% से 90% तक है। इसी को देखते हुए आईएमडी ने भी मानसूनी बारिश का ग्राफ 92% से घटाकर 90% कर दिया है। इस कमजोर मानसून के कारण उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु समेत देश के 12 बड़े राज्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और किसानों की आमदनी पर सीधा डेंट लगेगा।
आसमान छू सकते हैं टमाटर और सब्जियों के दाम; चिंता में RBI
कमजोर मानसून और लगातार बढ़ती लू का सबसे पहला और तीखा असर आपकी रसोई के बजट पर पड़ने वाला है। अत्यधिक गर्मी के कारण खेतों में टमाटर, हरी मिर्च और गोभी जैसी जरूरी सब्जियों का उत्पादन भारी मात्रा में घट गया है, जिससे मंडियों में इनकी आवक कम होने से कीमतें बढ़ने लगी हैं। सब्जियां, फल, खाद्य तेल और मसालों के दाम लगातार महंगे हो रहे हैं।
'एसबीआई रिसर्च' (SBI Research) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि अल नीनो का प्रकोप इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले हफ्तों में टमाटर की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं। देश में महंगाई की इस गंभीर स्थिति और अनिश्चितता को भांपते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा मुद्रास्फीति (महंगाई दर) का अपना पुराना अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है, जिसका सीधा मतलब है कि आने वाले दिनों में बाजार में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बेहद कम है।