रक्षा परियोजनाओं में देरी पर राजनाथ सिंह सख्त, कहा- बढ़ती है लागत, आउटडेटेड होती है तकनीक
देश की रक्षा तैयारियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक रहा, जब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कॉम्प्लेक्स बेंगलुरु से एक ही मंच से तीन प्रमुख स्वदेशी एविएशन प्लेटफॉर्म्स औपचारिक रूप से सौंपे गए। इस महत्वपूर्ण अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू और भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। समारोह के दौरान जहां एक तरफ स्वदेशी रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती तकनीकी महारत की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई, वहीं दूसरी तरफ रक्षा मंत्री ने विभिन्न स्वदेशी परियोजनाओं में हो रहे असाधारण विलंब को लेकर देश के रक्षा विनिर्माताओं और नीति निर्धारकों को आईना भी दिखाया।
देरी से बढ़ता है वित्तीय बोझ और आउटडेटेड हो जाती है तकनीक: राजनाथ सिंह की खरी-खरी
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने परियोजनाओं में देरी के दुष्प्रभाव पर खुलकर बात करते हुए कहा कि किसी भी सामरिक प्रोजेक्ट में समय-सीमा का उल्लंघन सीधे तौर पर दोहरे नुकसान को जन्म देता है। पहला नुकसान यह होता है कि परियोजना की अनुमानित लागत में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ता है। दूसरा और कहीं अधिक गंभीर खतरा यह है कि आधुनिक युद्ध कौशल के इस दौर में तकनीक बहुत तेजी से बदलती है, और अत्यधिक समय लगने की स्थिति में संबंधित रक्षा उत्पाद या तकनीक सेवा में शामिल होने से पहले ही पुरानी (आउटडेटेड) पड़ जाती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सभी रक्षा उपक्रमों और अनुसंधान संस्थानों को अब महत्वाकांक्षी नारों से आगे बढ़कर वास्तविक और व्यावहारिक समय-सीमा (प्रैक्टिकल डेडलाइन) तय करनी होगी, ताकि सेनाओं को आधुनिक हथियार समय पर मिल सकें।
तेजस एमके1ए डिलीवरी में बाधा और वायुसेना की गिरती स्क्वाड्रन क्षमता पर चिंता के बादल
रक्षा मंत्री की यह कड़ी टिप्पणी ऐसे समय पर सामने आई है जब भारतीय वायुसेना के बेड़े को मजबूत करने के लिए HAL को दिए गए 180 तेजस एमके1ए लड़ाकू विमानों की आपूर्ति समय से काफी पीछे चल रही है। इनमें वर्ष 2021 में अनुबंधित 83 जेट्स और 2025 में 97 अतिरिक्त फाइटर्स के लिए हस्ताक्षरित कुल 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के विशाल सौदे शामिल हैं। उन्नत मिसाइल और राडार एकीकरण (इंटीग्रेशन) की तकनीकी चुनौतियों के चलते इस प्रोजेक्ट में विलंब दर्ज किया जा रहा है। इस लेटलतीफी का सीधा दुष्प्रभाव भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारियों पर पड़ रहा है। वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास स्वीकृत 42.5 स्क्वाड्रन के मुकाबले मात्र 29 स्क्वाड्रन ही सक्रिय रह गए हैं, जिससे अग्रिम मोर्चे पर सामरिक दबाव बढ़ रहा है।
एक ही दिन में तीन स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स की डिलीवरी: देश के एविएशन इतिहास का नया मील का पत्थर
चिंताओं के बीच इस समारोह ने भारतीय एयरोस्पेस क्षेत्र के लिए एक नया गौरवशाली अध्याय भी लिखा। HAL के सीएमडी रवि के. ने बताया कि उनके टेस्ट पायलट्स और इंजीनियरों ने बेहद जटिल व प्रतिकूल परिस्थितियों में इन एविएशन प्लेटफॉर्म्स का परीक्षण पूरा कर इन्हें परिचालन योग्य प्रमाणन दिलाया। इस संयुक्त समारोह में भारतीय वायुसेना को दो एफओसी एलसीए एमके1 ट्रेनर विमान और तीन एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर विमान सौंपे गए। इसके साथ ही, पवन हंस लिमिटेड के बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए चार स्वदेशी ध्रुव एनजी (न्यू जेनरेशन) नागरिक हेलीकॉप्टरों की चाबियां भी सौंपी गईं, जो सैन्य उपयोग वाले एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) का पूरी तरह नागरिक-प्रमाणित उन्नत संस्करण हैं।
एलसीए एमके1 का पूरा हुआ कोटा और शुरू हुई 'अंकुर' एचटीटी-40 की नई उड़ान
समारोह के दौरान वायुसेना को दो एफओसी ट्रेनर एयरक्राफ्ट मिलते ही HAL ने 2006 और 2010 के दो अलग-अलग अनुबंधों के तहत स्वीकृत सभी 40 एलसीए एमके1 जेट्स की डिलीवरी का काम शत-प्रतिशत पूरा कर लिया। इसके समानांतर, रक्षा मंत्रालय के साथ हस्ताक्षरित 70 विमानों के ऐतिहासिक सौदे के तहत आधिकारिक रूप से 'अंकुर' नाम दिए गए एचटीटी-40 बेसिक ट्रेनर विमानों की पहली खेप वायुसेना के हवाले कर दी गई। दशकों से भारतीय कैडेट्स के बुनियादी प्रशिक्षण के लिए विदेशी आयातित बेसिक ट्रेनर विमानों पर निर्भरता बनी हुई थी, जिसे एचटीटी-40 ने पूरी तरह समाप्त कर दिया है। यह नया स्वदेशी ट्रेनर विमान न केवल भारतीय वायुसेना के भावी फाइटर पायलट्स को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मित्र देशों को रक्षा निर्यात का भी एक सशक्त माध्यम बनेगा।
वैज्ञानिकों और युवाओं को नया आह्वान: 'चमत्कार नहीं होता, अब उन तकनीकों को गढ़ें जो आज मौजूद नहीं'
रक्षा मंत्री ने समारोह में मौजूद युवा वैज्ञानिकों, एयरोस्पेस इंजीनियरों, डिजाइनरों और तकनीशियनों को नई ऊर्जा के साथ काम करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि एयरोस्पेस उद्योग में कोई अचानक चमत्कार नहीं होता, यह एक निरंतर, वैज्ञानिक और अनुशासित विकास प्रक्रिया है। उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की कि वे आने वाले कल की उन तकनीकों को आज डिजाइन करने का जोखिम उठाएं जो दुनिया में फिलहाल मौजूद ही नहीं हैं। भारत को वैश्विक एयरोस्पेस परिदृश्य में शीर्ष स्थान तभी मिल सकता है जब देश में नागरिक और सैन्य दोनों जरूरतों को पूरा करने वाला एक साझा व सुदृढ़ एविएशन इकोसिस्टम विकसित किया जाए।