Drought Threat in India: क्या भारत पर मंडरा रहा सूखे का बड़ा खतरा? 147 संवेदनशील जिलों में उम्मीद से कम बारिश, देश के 54 बड़े जलाशय सूखने की कगार पर
देश भर में दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है, लेकिन मानसूनी बारिश का असमान और अनिश्चित वितरण अब देश के एक बड़े हिस्से के लिए गंभीर चिंता का सबब बन गया है। कागजी तौर पर भले ही समग्र मानसूनी आंकड़े कई जगह सामान्य के आसपास नजर आ रहे हों, लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद नाजुक है। केंद्र सरकार द्वारा संभावित एल नीनो और कमजोर मानसून के जोखिम के आधार पर चिह्नित किए गए 315 अति-संवेदनशील जिलों में से 147 जिलों (लगभग 47%) में 1 जून से 30 अगस्त के बीच सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ताजा रिपोर्ट ने नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है, जिसके अनुसार देश के 54 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण सामान्य स्तर के 80 प्रतिशत से भी नीचे गिर चुका है, जिससे आने वाले महीनों में खरीफ फसलों, पेयजल आपूर्ति और पनबिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ने की आशंका है।
315 संवेदनशील जिलों की पड़ताल: 147 जिलों में सूखे जैसे हालात
केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने मानसून की शुरुआत में ही कमजोर वर्षा और एल नीनो के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए देश के 25 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के 315 जिलों को तीन प्राथमिक श्रेणियों में बांटा था:
-
हाई-प्रायोरिटी जिले (111 जिले): ऐसे जिले जहां 25 प्रतिशत से भी कम कृषि क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है और खेती पूरी तरह बारिश पर टिकी है।
-
मीडियम-प्रायोरिटी जिले (76 जिले): जहां 25 से 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र सिंचित है।
-
लो-प्रायोरिटी जिले (128 जिले): जहां 50 प्रतिशत से अधिक हिस्से में नहरी या ट्यूबवेल सिंचाई की व्यवस्था है।
डाउन टू अर्थ (DTE) की ताजा एनालिसिस रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति उन 111 हाई-प्रायोरिटी जिलों की है, जहां के किसान पूरी तरह बादलों पर निर्भर हैं। इन 111 जिलों में से 40 जिलों (करीब 36%) में सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है। वहीं मीडियम-प्रायोरिटी के 76 जिलों में से 43 जिलों (करीब 57%) और लो-प्रायोरिटी के 128 जिलों में से 64 जिलों (50%) में मानसूनी बारिश में भारी घाटा दर्ज किया गया है। 'इंडिया ड्रॉट मॉनिटर' (India Drought Monitor) के नवीनतम आकलन के अनुसार, वर्तमान में देश का 39.8 प्रतिशत भूभाग सूखे के विभिन्न स्तरों की चपेट में आ चुका है।
कहां बरसी आफत, कहां प्यासी रह गई धरती?
बारिश की कमी का सबसे कड़ा प्रहार दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और पश्चिमी भारत के कुछ इलाकों पर हुआ है:
-
कर्नाटक: राज्य के रामनगर जिले में 1 जून से 30 अगस्त के बीच सामान्य 283.5 मिमी के मुकाबले मात्र 19 मिमी बारिश दर्ज की गई, यानी यहां सीधे तौर पर 93 प्रतिशत बारिश की भारी कमी रही। इसके अलावा हासन जिले में 63 प्रतिशत कम बारिश हुई है।
-
पूर्वोत्तर भारत: असम के 8 अति-संवेदनशील जिलों में से 7 जिलों में 21 से 54 फीसदी तक बारिश कम हुई है। मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स में 72 प्रतिशत और नॉर्थ गारो हिल्स में 67 प्रतिशत बारिश की कमी आंकी गई है।
-
महाराष्ट्र: राज्य के 22 संवेदनशील जिलों में से 7 जिलों में सामान्य से 28 से 40 प्रतिशत तक कम बादल बरसे हैं।
दूसरी तरफ, इसी मानसून में मौसम की भारी विषमता भी देखने को मिली है। जहां 147 जिले पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे हैं, वहीं 30 संवेदनशील जिलों में सामान्य से अत्यधिक ज्यादा बारिश हुई है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के बागेश्वर में सामान्य से 152 प्रतिशत अधिक बारिश ने तबाही मचाई, जबकि महाराष्ट्र के नासिक में शुरुआती चार हफ्ते सूखे जैसे रहने के बाद अचानक इतनी भारी बारिश हुई कि कुल आंकड़ा सामान्य से 55 फीसदी ऊपर निकल गया।
54 बड़े जलाशयों में पानी का टोटा: 22 बांधों में आधा भी नहीं बचा पानी
केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा 166 प्रमुख जलाशयों की साप्ताहिक निगरानी रिपोर्ट से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे भयावह जल संकट की चेतावनी दे रहे हैं:
-
देश के 166 प्रमुख बांधों और जलाशयों में से 54 जलाशयों में लाइव स्टोरेज सामान्य के 80% से नीचे चला गया है।
-
इनमें से 22 जलाशय ऐसे हैं जिनमें सामान्य भंडारण का 50 प्रतिशत (आधा) या उससे भी कम पानी शेष रह गया है।
-
सबसे विकट स्थिति दक्षिण भारत की है, जहां के 47 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का मात्र 30.26 प्रतिशत पानी ही बचा है।
-
तेलंगाना के जलाशयों में सामान्य से 57 प्रतिशत कम पानी दर्ज हुआ है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के प्रमुख बांध जैसे श्रीशैलम, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा, कृष्णराज सागर (KRS), पेरियार, वैगई, सिंगूर और मऊदाहा जल भंडारण के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।
खेती, बिजली और खाद्य महंगाई पर क्या पड़ेगा असर?
मानसून के अंतिम महीने में यदि अच्छी बारिश नहीं होती है, तो इसके बहुआयामी दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
-
खरीफ उत्पादन में गिरावट: धान, दलहन (अरहर, उड़द), तिलहन और मोटे अनाजों की फसलों को पकने के लिए अंतिम चरण में पानी की सख्त दरकार होती है। बारिश की कमी से उत्पादन प्रभावित होने और पैदावार घटने का सीधा खतरा है।
-
रबी फसलों की बुवाई पर संकट: जलाशयों में कम पानी का सीधा मतलब है कि सर्दियों में आने वाली रबी फसलों (गेहूं, चना, सरसों) की सिंचाई के लिए नहरों में पर्याप्त पानी नहीं छोड़ा जा सकेगा, साथ ही भूजल का स्तर भी पर्याप्त रूप से रीचार्ज नहीं हो पाएगा।
-
हाइड्रोपावर और पेयजल किल्लत: दक्षिण और मध्य भारत के प्रमुख शहरों में गर्मियों से पहले ही पीने के पानी की राशनिंग की नौबत आ सकती है, जबकि प्रमुख बांधों में पानी कम रहने से पनबिजली (Hydroelectric Power) उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के विदाई के दौर में यदि बंगाल की खाड़ी से कोई मजबूत वेदर सिस्टम सक्रिय नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न महंगाई (Food Inflation) को नियंत्रित रखना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।