युवाओं को सही दिशा नहीं मिली तो देश के लिए बन जाएंगे बड़ा बोझ! Gen-Z को लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की बड़ी चेतावनी
आज के समय में जब पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है और तकनीकी क्रांतियों का दौर चल रहा है, तब देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने आज की युवा पीढ़ी यानी 'जेन-जी' (Gen-Z) को लेकर एक बेहद गंभीर और विचारणीय बयान दिया है। नागपुर में एक प्रमुख सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में मोहन भागवत ने दो टूक शब्दों में यह चेतावनी दी है कि यदि आज के युवाओं को सही समय पर उचित दिशा, संस्कार और मार्गदशन नहीं मिला, तो यही युवा शक्ति देश की ताकत बनने के बजाय देश के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और सामाजिक बोझ बन सकती है। संघ प्रमुख के इस बयान ने देश भर के शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों, राजनेताओं और अभिभावकों के बीच एक गहरी बहस छेड़ दी है, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी के सामने करियर के अपार अवसरों के साथ-साथ भटकाव और मानसिक तनाव के भी उतने ही बड़े खतरे मंडरा रहे हैं। आइए मोहन भागवत के इस बयान के गहरे निहितार्थों और आज के दौर में जेन-जी के सामने मौजूद चुनौतियों का बेहद विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
क्या है 'जेन-जी' और क्यों चिंता जता रहे हैं मोहन भागवत?
आधुनिक भाषा विज्ञान और जनसांख्यिकी में 'जेन-जी' (Gen-Z) उस पीढ़ी को कहा जाता है जिसका जन्म और लालन-पालन इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया के बीच हुआ है। यह पीढ़ी तकनीक के मामले में बेहद तेज, महत्वाकांक्षी और स्वतंत्र विचारों वाली मानी जाती है, लेकिन इसके साथ ही इस पीढ़ी में सहनशीलता की कमी, तात्कालिक संतुष्टि की चाह (Instant Gratification) और अकेलेपन की समस्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इसी बात को रेखांकित करते हुए कहा कि आज का युवा अत्यधिक हाई-टेक और ज्ञान से परिपूर्ण तो है, परंतु यदि उसके भीतर नैतिक मूल्य, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक सरोकार और सही-गलत की पहचान करने की विवेकशीलता नहीं होगी, तो यह ऊर्जा गलत दिशा में भटक सकती है। जब एक पूरी पीढ़ी बिना किसी वैचारिक एंकर या नैतिक अनुशासन के केवल भौतिकतावादी दौड़ में अंधी हो जाती है, तो वह समाज और राष्ट्र के विकास में सहयोग करने के बजाय समस्याओं का कारण बन जाती है, और यही वह मूल चिंता है जिसे संघ प्रमुख ने देश के सामने बहुत ही स्पष्ट रूप से रखा है।
आधुनिक युग की चकाचौंध और युवाओं के सामने भटकाव के बड़े खतरे
आज के दौर में युवाओं के पास करियर के हजारों विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इसी के साथ सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डाला है। रील्स, शॉर्ट्स और लाइक्स की अंधी दौड़ ने युवाओं की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Attention Span) को बहुत सीमित कर दिया है। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में इसी बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी बहुत जल्दी निराश हो जाती है और छोटी-छोटी असफलताओं को भी सहन नहीं कर पाती है। इसके अलावा, पश्चिमी संस्कृतियों का अंधाधुंध अनुकरण, ड्रग्स और नशे की लत, तथा परिवार और समाज से कटती जा रही जीवनशैली युवाओं को धीरे-धीरे एक खोखलेपन की तरफ धकेल रही है। यदि देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत नहीं होगा और उसके भीतर राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण की भावना नहीं जगेगी, तो भारत की यह डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) यानी युवाओं की संख्या वाली ताकत एक दिन देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप साबित हो सकती है।
संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों की घटती भूमिका का संकट
संघ प्रमुख ने अपने भाषण में इस बात पर भी जोर दिया कि आज के समय में परिवारों का विघटन और संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना युवाओं के भटकने का एक बहुत बड़ा कारण बन रहा है। पहले के समय में संयुक्त परिवारों में बच्चों को जो अनौपचारिक शिक्षा, बुजुर्गों का आशीर्वाद, धैर्य और संकट से लड़ने की प्रेरणा मिलती थी, वह आज के न्यूक्लियर परिवारों और भागदौड़ भरी जिंदगी में गायब होती जा रही है। माता-पिता अक्सर बच्चों की материаल (भौतिक) जरूरतें तो पूरी कर देते हैं, लेकिन उन्हें समय और सही संवाद नहीं दे पाते हैं, जिसके कारण युवा मानसिक रूप से अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं। मोहन भागवत ने आह्वान किया कि समाज और परिवार को मिलकर एक ऐसा मजबूत और सकारात्मक वातावरण तैयार करना होगा जहां युवा अपनी समस्याओं को खुलकर साझा कर सकें और उन्हेंन केवल किताबी ज्ञान, बल्कि जीवन जीने की कला और संस्कारों की थाती भी मिल सके।
भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड को सही दिशा देने की राष्ट्रीय अनिवार्यता
आज पूरी दुनिया इस बात को मानती है कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, और हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा वर्कफोर्स मौजूद है। इस स्थिति को ही 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यदि हमारे युवाओं को सही कौशल, अच्छी शिक्षा और रोजगार के अवसर मिल जाएं, तो भारत अगले कुछ दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और वैचारिक महाशक्ति बन सकता है। लेकिन मोहन भागवत की यह चेतावनी इस बात की याद दिलाती है कि यह डिविडेंड अपने आप में कोई गारंटी नहीं है; यदि हमने युवाओं को सही समय पर वैल्यू बेस्ड एजुकेशन (मूल्य आधारित शिक्षा) और राष्ट्रोन्मुखी दिशा नहीं दी, तो यही डेमोग्राफिक डिविडेंड एक बड़े सामाजिक संकट में बदल सकता है। इसलिए सरकार, शिक्षण संस्थानों, धार्मिक और सामाजिक संगठनों तथा अभिभावकों को सामूहिक रूप से यह सोचना होगा कि कैसे वे देश की इस युवा ऊर्जा को रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों में लगा सकें।
युवाओं को क्या करना चाहिए और समाज की क्या है जिम्मेदारी?
इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही निकलता है कि आज के युवाओं को अपनी ऊर्जा को सोशल मीडिया की फालतू बहसों और नकारात्मकता से निकालकर देश के विकास, कौशल विकास और नवाचार में लगाना चाहिए। युवाओं को यह समझना होगा कि शॉर्टकट से कभी भी स्थायी सफलता नहीं मिलती है, और जीवन में अनुशासन ही सबसे बड़ी पूंजी है। इसके साथ ही, समाज के हर वर्ग को यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि वे युवाओं के मार्गदर्शक बनें, उनकी समस्याओं को समझें और उन्हेंन केवल एक अच्छा प्रोफेशनल बनाएं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक भी तैयार करें। तभी मोहन भागवत द्वारा जताई गई चिंता का समाधान निकल सकेगा और भारत की यह युवा शक्ति दुनिया के नक्शे पर एक स्वर्णिम इतिहास रचने में कामयाब होगी।