पुलिस और वकीलों के टकराव पर लगाम कैसे लगे? वर्दी और काले कोट

पुलिस और वकीलों के टकराव पर लगाम कैसे लगे? वर्दी और काले कोट

देश के विभिन्न हिस्सों से अक्सर पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच झड़प, मारपीट और अदालती कामकाज ठप होने की खबरें सामने आती रहती हैं, जो कि एक स्वस्थ और सभ्य लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक विषय है। न्याय व्यवस्था के दो सबसे महत्वपूर्ण पहिए—एक तरफ जहां नागरिकों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस की 'वर्दी' है, तो दूसरी तरफ न्याय दिलाने के लिए पैरवी करने वाले वकीलों का 'काला कोट' है। जब ये दोनों ही वर्ग अपनी सीमाओं को लांघकर आमने-सामने आ जाते हैं, तो न केवल आम जनता पिसती है बल्कि पूरे न्याय तंत्र की गरिमा पर भी बट्टा लगता है। आए दिन थानों से लेकर कोर्ट परिसरों तक होने वाले ये टकराव अब किसी एक शहर या अदालत तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि एक राष्ट्रीय समस्या का रूप लेते जा रहे हैं, जिस पर समय रहते लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है।

समन्वय और संवाद की कमी बनी टकराव की सबसे बड़ी वजह

कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि पुलिस और वकीलों के बीच बढ़ते तनाव का मुख्य कारण आपसी संवाद की भारी कमी और एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र के प्रति सम्मान का अभाव है। कई बार मामलों की जांच के दौरान पुलिस अधिकारियों का रवैया जांच के नाम पर आक्रामक हो जाता है, तो वहीं वकीलों का यह मानना होता है कि पुलिस न्यायिक प्रक्रिया और उनके अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है। मामूली कहासुनी, ट्रैफिक चालान, पार्किंग विवाद या फिर किसी आरोपी की पेशी के दौरान होने वाली छोटी-सी बहस देखते ही देखते बड़े आंदोलन, हड़ताल और हिंसक संघर्ष का रूप ले लेती है। अदालतों में जजों और बार एसोसिएशन के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत तो हो जाता है, लेकिन इस तरह की घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं जो यह साबित करती हैं कि दोनों पक्षों के बीच कोई स्थायी और प्रभावी संवाद तंत्र विकसित नहीं हो पाया है।

वर्दी और काले कोट दोनों को समझनी होगी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी

इस गंभीर समस्या का समाधान निकालने के लिए यह जरूरी है कि पुलिस बल और बार एसोसिएशन के सदस्य अपनी-अपनी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों को समझें। पुलिसकर्मियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कानून के दायरे में रहकर काम करने के लिए बाध्य हैं और किसी भी नागरिक या अधिवक्ता के साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार उन्हें नहीं है। वहीं दूसरी ओर, वकीलों को भी यह आत्मમंथन करना होगा कि अदालत परिसर कानून का मंदिर है और न्याय की रक्षा करना उनका भी उतना ही बड़ा दायित्व है जितना कि न्यायपालिका का। विरोध प्रदर्शन या हड़ताल के नाम पर अदालती कामकाज को रोकना और आम मुवक्किलों को परेशानी में डालना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

त्वरित और पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र की सख्त जरूरत

पुलिस और वकीलों के बीच के इस कड़वे संघर्ष पर हमेशा के लिए विराम लगाने के लिए उच्च स्तर पर पुख्ता कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रत्येक जिला न्यायालय और पुलिस कमिश्नरेट स्तर पर एक ऐसी संयुक्त समन्वय समिति (Joint Coordination Committee) का गठन किया जाना चाहिए जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश, पुलिस अधिकारी और बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि शामिल हों ताकि किसी भी विवाद के उठने पर उसे तुरंत बातचीत के जरिए सुलझाया जा सके। इसके साथ ही, पुलिसकर्मियों और युवा वकीलों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में एथिक्स, मानवीय व्यवहार और पेशेवर मर्यादा के पाठ को अनिवार्य किया जाना चाहिए। जब तक 'वर्दी' और 'काला कोट' दोनों ही वर्ग अहंकार को छोड़कर आपसी सहयोग की भावना को नहीं अपनाएंगे, तब तक आम जनता को इस अवांछित संघर्ष से मुक्ति नहीं मिल सकती।