EVM Totaliser Case: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा, 18 साल से क्यों अटका है ईवीएम 'टोटलाइजर' का मामला
भारतीय चुनावी प्रणाली में गोपनीयता और पारदर्शिता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद अहम और बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह तीखा सवाल किया है कि मतगणना के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के वोटों को आपस में मिलाने यानी पूल करने के लिए 'टोटलाइजर' (Totaliser) उपकरण का उपयोग कानूनी रूप से क्यों नहीं किया जा रहा है। चुनाव आयोग पिछले लगभग 18 सालों से लगातार यह मांग कर रहा है कि उसे बूथ-वार नतीजों की बारीक जानकारी छिपाने और मतदाताओं की निजता सुरक्षित रखने के लिए टोटलाइजर के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को एक विशिष्ट और विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह तकनीक वोटरों की पहचान को सुरक्षित रखने और चुनाव के बाद होने वाले संभावित राजनीतिक प्रतिशोध या उत्पीड़न से बचाने में एक बहुत ही कारगर और अच्छा जरिया साबित हो सकती है।
वर्तमान समय में चुनावी व्यवस्था का नियम यह कहता है कि मतगणना के दिन हर एक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का कंट्रोल यूनिट एक-एक करके क्रमानुसार खोला जाता है। इसके बाद उसके परिणामों को उस विशिष्ट पोलिंग स्टेशन के नाम और पहचान के साथ सार्वजनिक रूप से दर्ज किया जाता है जहां से वह मशीन लाई गई थी। जब तक मतगणना हॉल में आखिरी मशीन के नतीजे पढ़े जाते हैं, तब तक चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार को केवल यह बात ही पता नहीं चलती कि वह जीत रहा है या हार रहा है, बल्कि उसे यह भी साफ-साफ पता चल जाता है कि विधानसभा क्षेत्र के लगभग दो सौ अलग-अलग इलाकों में से किन-किन बूथों और मोहल्लों ने उसे भारी समर्थन दिया है और किस इलाके के मतदाताओं ने उसके खिलाफ मतदान किया है। यह बेहद संवेदनशील और बारीक चुनावी जानकारी 'चुनाव संचालन नियम, 1961' के तहत ईवीएम वोटों की गिनती के मौजूदा तय तरीके का सीधा नतीजा है। इसी व्यवस्था पर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से जवाब तलब किया है।
क्या है टोटलाइजर मशीन और यह कैसे काम करती है?
टोटलाइजर तकनीक कोई नई तकनीक नहीं है, बल्कि भारत के निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2016 के अपने एक प्रस्ताव पत्र में इसके इस्तेमाल की जोरदार वकालत की थी। टोटलाइजर अनिवार्य रूप से एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या मशीन है जिसे विशेष केबल के माध्यम से ईवीएम से जोड़ा जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही बार में चौदह अलग-अलग वोटिंग मशीनों में दर्ज किए गए वोटों को आपस में जोड़ या मिला देता है। इस तकनीक के माध्यम से उम्मीदवारों और उनके काउंटिंग एजेंटों को यह तो पता चल जाता है कि कुल कितने वोट पड़े हैं और किस उम्मीदवार को कुल कितने मत मिले हैं, लेकिन किसी एक विशिष्ट मशीन यानी विशेष पोलिंग बूथ का अलग से अलग-थलग नतीजा सामने नहीं आता है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि टोटलाइज़र चौदह अलग-अलग बूथों के लिए अलग-अलग टैली दिखाने के बजाय उन चौदह बूथों के लिए एक ही संयुक्त टैली देता है। दिलचस्प बात यह है कि देश की दो प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स इकाइयां—भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL)—ने साल 2007 में ही इस उन्नत तकनीक का सफल प्रदर्शन कर दिखाया था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह ठंडे बस्ते में पड़ी रही।
मौजूदा बूथ-वार मतगणना की प्रणाली ने देश के कई हिस्सों में मतदाताओं के लिए एक नया और गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वी.एस. संपत ने भी साल 2013 में तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री को एक आधिकारिक पत्र लिखकर गहरी चिंता जताई थी कि बूथ-वार गिनती से चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक दलों या स्थानीय दबंगों द्वारा मतदाताओं को उत्पीड़न, प्रतिशोध, डराने-धमकाने या सामाजिक-आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। लोकतंत्र में मतदान गुप्त होता है, लेकिन जब किसी छोटे गांव या मोहल्ले के पांच सौ वोटों में से किसी एक पार्टी को सिर्फ दो वोट मिलते हैं, तो स्थानीय नेताओं को यह समझने में देर नहीं लगती कि किसने किसे वोट दिया था। ऐसी खतरनाक और संवेदनशील स्थिति में 'टोटलाइजर' मशीन इस प्रकार के हर खतरे को जड़ से दूर करने का सबसे प्रभावी और अचूक माध्यम बन सकती है, जिससे मतदाता बिना किसी डर के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे।
चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के अपने तर्क और आपत्तियां
भले ही चुनाव आयोग लंबे समय से इस नियम को बदलकर टोटलाइजर प्रणाली को लागू करने की मांग करता रहा है, लेकिन आयोग ने अपने हालिया हलफनामों में कुछ व्यावहारिक और तकनीकी आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। आयोग के सचिव द्वारा पूर्व में दायर हलफनामे के मुताबिक, वोटों को एक साथ मिलाने से ईवीएम की सुरक्षा और आंकड़ों के सत्यापन (verification) की एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी टूट जाएगी। फिलहाल की व्यवस्था के अनुसार, मतदान समाप्त होने के बाद फॉर्म 17सी के भाग I में दर्ज कुल वोटों की संख्या का मिलान मतगणना के दिन भाग II से करके किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या टेंपरिंग का तुरंत पता लगा लिया जाता है। यदि एक साथ चौदह मशीनों के वोटों को आपस में पूल कर दिया गया, तो भविष्य में किसी एक मशीन में आई तकनीकी खराबी या मानवीय त्रुटि को पकड़ पाना लगभग असंभव हो जाएगा।
इसके अलावा, राजनीतिक दलों और प्रशासनिक स्तर पर भी इसे लेकर भारी मतभेद देखने को मिले हैं। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा गठित मंत्रियों के एक विशेष समूह ने इस प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया था कि बूथ-वार मतदान के विस्तृत आंकड़े राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को यह गहराई से समझने में मदद करते हैं कि किस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र या पॉकेट में विकास कार्यों, सड़क, बिजली या पानी की अधिक आवश्यकता है। इसके अलावा देश के प्रमुख राजनीतिक दलों में भी इसे लेकर कोई एकराय नहीं है; देश के बड़े राष्ट्रीय दलों और दर्जनों राज्य स्तरीय दलों ने इसके पक्ष और विपक्ष में बंटी हुई प्रतिक्रियाएं दी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को इस पूरे मामले के सभी जटिल कानूनी पहलुओं और व्यावहारिक बाधाओं की गहराई से जांच करने का निर्देश दिया है। साथ ही, अदालत ने चुनाव आयोग को यह भी सलाह दी है कि वे सरकार और संसद के समक्ष इस महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे पर पुनर्विचार के लिए दोबारा प्रस्ताव लेकर जाएं, क्योंकि चुनावी नियमों में संशोधन करने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार और विधायिका के पास ही निहित है।