SC पहुंचा चुनाव आयोग का अंदरूनी विवाद: CEC ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों के खिलाफ याचिका

SC पहुंचा चुनाव आयोग का अंदरूनी विवाद: CEC ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों के खिलाफ याचिका

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के शीर्ष स्तर पर उपजा गंभीर आंतरिक मतभेद और नीतिगत विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली, चुनाव आयोग की आधिकारिक कार्यप्रणाली और कथित तौर पर दोनों साथी चुनाव आयुक्तों की औपचारिक सहमति के बिना लिए गए महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका के दाखिल होते ही देश के प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में भारी खलबली मच गई है। याचिका में अत्यंत कड़े आरोप लगाते हुए कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा आयोग के स्थापित सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के वैधानिक नियमों को दरकिनार किया गया है, जो सीधे तौर पर लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर गंभीर आघात है। चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर उच्चतम न्यायालय में इस तरह की सीधी चुनौती हाल के दशकों में सबसे असाधारण और अभूतपूर्व न्यायिक मामलों में से एक मानी जा रही है।

किसने दायर की याचिका: अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने उठाई आवाज

सुप्रीम कोर्ट में यह बहुचर्चित याचिका सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से औपचारिक रूप से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता ने संवैधानिक प्रावधानों और चुनाव आयोग से जुड़े अधिनियमों का विस्तृत हवाला देते हुए शीर्ष अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा अपने पद पर रहते हुए कथित तौर पर साथी चुनाव आयुक्तों की सहमति या चर्चा के बिना जारी किए गए सभी दिशा-निर्देशों, प्रशासनिक परिपत्रों, नीतिगत प्रस्तावों और चुनाव प्रबंधन से जुड़े डिजिटल सॉफ्टवेयर सिस्टम में किए गए सभी बदलावों को असंवैधानिक, मनमाना और शून्य (अमान्य) घोषित करने की पुरजोर मांग की गई है। याचिका में जोर देकर कहा गया है कि निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जिसे संविधान निर्माताओं ने किसी एक व्यक्ति की निजी इच्छा या एकाधिकार से चलाने के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक मंथन और निष्पक्ष संस्थागत सहमति से कार्य करने के लिए गढ़ा था।

सामूहिक निर्णय लेने की संवैधानिक अनिवार्यता का कथित खुला उल्लंघन

याचिका में उठाए गए कानूनी आधारों के अनुसार, चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम के स्पष्ट नियम यह तय करते हैं कि आयोग के सभी महत्वपूर्ण निर्णय आयोग की बैठक में सामूहिक सहमति अथवा बहुमत के आधार पर ही लिए जाने चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल 'समानों में प्रथम' (फर्स्ट अमंग इक्वल्स) का दर्जा प्राप्त है, न कि अपने साथी आयुक्तों के अधिकारों को दबाने या वीटो करने का कोई विशेष एकाधिकार। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ज्ञानेश कुमार ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों, सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर में फेरबदल और चुनावी दिशा-निर्देशों को तय करने की प्रक्रिया में अन्य दोनों आयुक्तों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए एकतरफा आदेश पारित किए। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस प्रकार की एकतरफा कार्यप्रणाली न केवल आयोग की वैधानिक बाध्यताओं का उल्लंघन करती है, बल्कि देश की संपूर्ण चुनावी व्यवस्था की साख और जनता के भरोसे को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है।

आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की गंभीर मांग: कर्तव्य के उल्लंघन का आरोप

इस याचिका का सबसे कड़ा और संवेदनशील पहलू यह है कि इसमें केवल निर्णयों को रद्द करने की मांग नहीं की गई है, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त और इस प्रक्रिया में शामिल अन्य दोषी अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कानूनी कदम उठाने की अपील की गई है। याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया है कि पद के दुरुपयोग, आधिकारिक शक्तियों के अनधिकृत उपयोग और लोक सेवक के रूप में निर्धारित संवैधानिक कर्तव्य के जानबूझकर किए गए उल्लंघन से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा अन्य संबंधित शीर्ष अधिकारियों के विरुद्ध स्वतंत्र आपराधिक कार्यवाही (क्रिमिनल प्रोसीडिंग्स) शुरू करने के निर्देश जारी किए जाएं। याचिका में कहा गया है कि यदि एक संवैधानिक संस्था के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति ही कानून और प्रक्रियाओं की अवहेलना करने लगे, तो देश में कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) की रक्षा के लिए न्यायपालिका का सख्त रुख अपनाना अनिवार्य हो जाता है।

दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों से फूटा था विवाद का ज्वालामुखी

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका उस सनसनीखेज रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के कुछ ही दिनों बाद सामने आई है, जिसने पूरे देश में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स और आंतरिक दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ था कि आयोग के दोनों वरिष्ठ चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने चुनाव आयोग के नाम पर हाल के महीनों में लिए गए कई महत्वपूर्ण फैसलों, एसआईआर (SIR) से जुड़े नीतिगत निर्णयों और बिना बोर्ड बैठक बुलाए पारित किए गए सर्कुलरों पर अपनी गंभीर लिखित आपत्तियां और असहमति दर्ज कराई थी। दोनों आयुक्तों के आधिकारिक विरोध के बावजूद उन फैसलों को आयोग के साझा निर्णय के रूप में लागू करने के प्रयासों ने इस पूरे विवाद को जन्म दिया। इस आंतरिक बगावत की खबर सामने आते ही विपक्षी दलों ने जहां संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की घोषणा कर दी, वहीं अब यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के कानूनी कठघरे में पहुंच चुका है, जहां आने वाले दिनों में देश की चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता और शीर्ष संस्थागत मर्यादाओं पर गहन न्यायिक मंथन होना तय माना जा रहा है।