2 अक्टूबर को 'No UPI Day' की खबरों पर व्यापारी संगठनों का बड़ा यू-टर्न: बोले- हमने तो कोई ऐसा फैसला ही नहीं लिया, सिर्फ फैलाई गई अफवाह
महात्मा गांधी की जयंती यानी 2 अक्टूबर को देशभर में 'नो यूपीआई डे' (No UPI Day) मनाए जाने, दुकानों पर लगे क्यूआर कोड स्टैंड पर काला कपड़ा बांधने और केवल नकद (Cash) में लेन-देन करने की वायरल खबरों के बीच भारतीय व्यापारी संगठनों का बड़ा और आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आ गया है। सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और तकनीकी समस्याओं के विरोध में खुदरा व्यापारी 2 अक्टूबर को पूर्ण बहिष्कार करने जा रहे हैं। इस खबर से करोड़ों ऑनलाइन पेमेंट यूजर्स और त्योहारी खरीदारी की तैयारी कर रहे उपभोक्ताओं में अफरा-तफरी का माहौल बन गया था। अब देश के सबसे बड़े व्यापारी परिसंघ 'कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स' (CAIT) और प्रमुख रिटेल यूनियनों ने सामने आकर साफ लफ्जों में कह दिया है कि उन्होंने किसी भी ऐसे राष्ट्रव्यापी 'नो यूपीआई डे' का कोई औपचारिक आह्वान नहीं किया है और यह महज सोशल मीडिया पर फैलाया गया भ्रम है।
'हमने तो ऐसा कोई ऐलान ही नहीं किया...' व्यापारी नेताओं की दो टूक सफाई
सीएआईटी और दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, जयपुर समेत देश के प्रमुख व्यापार मंडलों के शीर्ष पदाधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि संगठन डिजिटल लेन-देन के विरोध में बिल्कुल नहीं है। व्यापारी प्रतिनिधियों ने कहा, "हमने तो 2 अक्टूबर को किसी तरह के 'नो यूपीआई डे' मनाने या क्यूआर कोड को काले कपड़े से ढकने की कोई आधिकारिक घोषणा या फैसला लिया ही नहीं है। कुछ स्थानीय गुटों या सोशल मीडिया पर वायरल बिना आधार के संदेशों के आधार पर यह अफवाह फैलाई गई है, जिससे आम जनता और छोटे दुकानदारों में अनावश्यक भ्रम की स्थिति बन गई।"
व्यापारी नेताओं ने रेखांकित किया कि आज का भारतीय रिटेल बाजार यूपीआई के बिना चल ही नहीं सकता। किराना, कपड़ा, मिठाई और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में 70 से 80 प्रतिशत ग्राहक जेब में बिना पर्स लिए सिर्फ स्मार्टफोन के सहारे खरीदारी करने निकलते हैं। ऐसे में त्योहारी सीजन के ऐन मुहाने पर यूपीआई बंद करने का कदम सीधे तौर पर व्यापारियों के अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।
तो फिर व्यापारियों की असली नाराजगी किस बात पर है?
हालांकि व्यापारी यूनियनों ने 'नो यूपीआई डे' के बहिष्कार की खबर का खंडन कर दिया है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया है कि डिजिटल पेमेंट्स इकोसिस्टम को लेकर उनकी कुछ वास्तविक और जायज समस्याएं हैं, जिन पर सरकार और वित्तीय सेवा विभाग (DFS) को ध्यान देना होगा:
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फिनटेक कंपनियों के छिपे हुए चार्ज: यूनियनों का आरोप है कि विभिन्न थर्ड-पार्टी ऐप्स साउंडबॉक्स रेंटल के नाम पर हर महीने 100 से 150 रुपये की मनमानी कटौती कर रहे हैं।
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व्यस्त समय में सर्वर फेल होना: त्योहारी भीड़ के समय बैंकों के सर्वर डाउन होने से ग्राहकों के पैसे कट जाते हैं और दुकानदार के पास नहीं पहुंचते। विवाद समाधान में 48 से 72 घंटे लगने से छोटे दुकानदारों की वर्किंग कैपिटल अटक जाती है।
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15 अक्टूबर से लागू होने वाले MDR फ्रेमवर्क को लेकर संशय: सरकार द्वारा 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई ट्रांजेक्शन पर प्रस्तावित नए नियमों को लेकर खुदरा व्यापारियों में आशंका बनी हुई है।
सरकार और एनपीसीआई की स्थिति पहले ही हो चुकी है स्पष्ट
व्यापारियों की इन चिंताओं के बीच केंद्र सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने पहले ही आधिकारिक तौर पर आश्वस्त किया है कि सामान्य बैंक-टू-बैंक यूपीआई ट्रांजेक्शन हमेशा की तरह शून्य शुल्क (Zero MDR) पर ही रहेगा।
आंकड़ों के मुताबिक, देश के 96% से अधिक खुदरा भुगतान ₹2,000 से कम के होते हैं, जिन पर 15 अक्टूबर के बाद भी कोई चार्ज नहीं लगेगा। इसके अतिरिक्त, जिन छोटे व्यापारियों का मासिक टर्नओवर 1 लाख रुपये तक है, वे पूरी तरह छूट के दायरे में हैं। बड़े रिटेलर्स और कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों पर लगने वाले चार्ज का भी कोई भी हिस्सा ग्राहकों से वसूलने की अनुमति नहीं है।
2 अक्टूबर को सुचारू रूप से चलेगा UPI, घबराने की जरूरत नहीं
यूनियनों के इस नए बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के दिन देश भर में डिजिटल भुगतान पूरी तरह सामान्य रहेगा। किसी भी दुकान, मॉल या पेट्रोल पंप पर ऑनलाइन पेमेंट बंद नहीं होगी और न ही उपभोक्ताओं को नकद पैसे निकालने के लिए एटीएम की कतारों में लगना पड़ेगा। व्यापारी संगठनों ने अपने सभी सदस्यों से अपील की है कि वे किसी भी असत्यापित संदेश पर ध्यान न दें और त्योहारी सीजन में ग्राहकों को कैशलेस और सुविधाजनक डिजिटल अनुभव देना जारी रखें।