दिल्ली मेट्रो की चेयरपर्सन डी. थारा ने सुप्रीम कोर्ट में मांगी बिना शर्त माफी, अवमानना नोटिस खारिज करने की लगाई गुहार

दिल्ली मेट्रो की चेयरपर्सन डी. थारा ने सुप्रीम कोर्ट में मांगी बिना शर्त माफी, अवमानना नोटिस खारिज करने की लगाई गुहार

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) की चेयरपर्सन और केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) में अतिरिक्त सचिव डी. थारा ने सर्वोच्च अदालत में हलफनामा दाखिल कर बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगी है। उन्होंने अदालत से उनके खिलाफ जारी किए गए अवमानना नोटिस (Contempt Notice) को रद्द करने और मामले को समाप्त करने का अनुरोध किया है।

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका और सर्वोच्च अदालत के प्रति उनके मन में सर्वोच्च सम्मान है। उन्होंने कहा कि उनके किसी भी आचरण या फैसले का उद्देश्य अदालत के आदेश की अवहेलना करना या उसकी गरिमा को कम करना नहीं था। यदि अनजाने में ऐसा कोई संदेश गया है, तो वे इसके लिए अदालत के समक्ष पूरी विनम्रता के साथ बिना शर्त क्षमा याचना करती हैं।

क्या है अवमानना नोटिस और विवाद की मुख्य वजह?

यह मामला दिल्ली मेट्रो से जुड़े विभिन्न कानूनी, प्रशासनिक और वित्तीय विवादों के क्रियान्वयन से संबंधित है:

  1. अदालती आदेशों के पालन में देरी: सुप्रीम कोर्ट ने डीएमआरसी से जुड़े एक पूर्व आदेश के अनुपालन को लेकर नाराजगी जताई थी। अदालत का मानना था कि निर्देशों के स्पष्ट होने के बावजूद उच्च स्तर पर आवश्यक स्वीकृतियों और औपचारिक कदमों को उठाने में जानबूझकर टालमटोल की गई या देरी की गई।

  2. जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस: अदालत ने आदेश का समय पर अनुपालन न होने पर सख्त रुख अपनाते हुए कॉरपोरेशन के शीर्ष नेतृत्व और मंत्रालय स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना था और यह पूछा था कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए।

  3. चेयरपर्सन की भूमिका: डीएमआरसी बोर्ड की प्रमुख होने के नाते डी. थारा को इस प्रक्रिया में स्पष्टीकरण देने के लिए अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था।

हलफनामे में डी. थारा ने क्या दी सफाई?

डी. थारा ने अदालत को आश्वस्त करते हुए अपने विस्तृत हलफनामे में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को रखा:

  • प्रक्रियागत जटिलताएं: उन्होंने बताया कि प्रशासनिक निर्णयों में केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और विभिन्न वित्तीय विभागों के बीच औपचारिक तालमेल और नीतिगत स्वीकृतियों की आवश्यकता होती है, जिसके चलते कुछ समय लगा।

  • कोई दुर्भावना नहीं: उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत के निर्देशों की अवहेलना करने का कोई जानबूझकर किया गया प्रयास (Willful Disobedience) नहीं था।

  • पूर्ण अनुपालन का आश्वासन: उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए सभी निर्देशों और आदेशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभागों को पहले ही आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं।

आगे क्या होगा सुप्रीम कोर्ट का रुख?

सुप्रीम कोर्ट में जब भी कोई वरिष्ठ लोक सेवक बिना शर्त और स्पष्ट माफी का हलफनामा दाखिल करता है, तो अदालत आमतौर पर यह देखती है कि क्या माफी वास्तविक पश्चाताप (Bona Fide) पर आधारित है और क्या मूल अदालती आदेश का पूरी तरह पालन कर लिया गया है।

यदि अदालत संतुष्ट होती है कि आदेश के अनुपालन की दिशा में ठोस कदम उठाए जा चुके हैं और अधिकारी का आचरण जानबूझकर अदालत की गरिमा गिराने का नहीं था, तो अदालत अवमानना नोटिस को निरस्त कर मामले को बंद करने पर विचार कर सकती है। आगामी सुनवाई में अदालत के अंतिम रुख पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।