अमेरिका में फिर भड़की महंगाई: सितंबर में CPI बढ़कर 3.7% पर पहुंचा, गैसोलीन में 9.1% की भारी तेजी ने बढ़ाई फेड की चिंता; भारत समेत वैश्विक बाजारों पर क्या होगा असर?
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में महंगाई को 2% के लक्ष्य तक सीमित करने की अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) की कवायदों को एक बार फिर झटका लगा है। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो (Bureau of Labor Statistics - BLS) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित वार्षिक खुदरा महंगाई दर 3.7% दर्ज की गई है।
बाजार विश्लेषक और अर्थशास्त्री उम्मीद कर रहे थे कि मौद्रिक सख्ती के चलते मुद्रास्फीति में और नरमी देखने को मिलेगी और यह घटकर 3.6% पर आ जाएगी। हालांकि, यह उम्मीदों से अधिक रही और पिछले महीने के 3.7% के स्तर पर ही टिकी रही। महीने-दर-महीने (Month-on-Month) आधार पर सीपीआई में 0.4% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति का दबाव अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
गैसोलीन और ऊर्जा की कीमतों में 9.1% का भारी उछाल बना मुख्य कारक
सितंबर महीने में मुद्रास्फीति के ऊंचे स्तर पर बने रहने के पीछे सबसे बड़ा योगदान ऊर्जा क्षेत्र, विशेषकर ऑटोमोबाइल ईंधन यानी गैसोलीन (Gasoline) का रहा है:
-
गैसोलीन इंडेक्स में उछाल: महीने-दर-महीने आधार पर गैसोलीन की कीमतों में 9.1% की तेज छलांग दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर अमेरिकी गैस स्टेशनों पर देखा गया।
-
ऊर्जा सूचकांक का समग्र असर: ऊर्जा सूचकांक (Energy Index) में कुल मिलाकर 5.6% की मासिक वृद्धि हुई, जिसने हेडलाइन सीपीआई को नीचे आने से रोक दिया।
-
शेल्टर और हाउसिंग कॉस्ट: आवास की लागत (Shelter Index) में भी लगातार वृद्धि जारी रही और यह मासिक आधार पर 0.6% बढ़ी। आवास लागत का कुल सीपीआई बास्केट में एक-तिहाई से अधिक वेटेज होता है, जिसके चलते किराए की ऊंची दरों ने भी महंगाई को सहारा दिया।
कोर सीपीआई (Core CPI) 4.1% पर फिसला: थोड़ी राहत, लेकिन चिंता बरकरार
हेडलाइन महंगाई के उलट, अधिक अस्थिर माने जाने वाले खाद्य (Food) और ऊर्जा (Energy) घटकों को अलग करके देखे जाने वाले कोर सीपीआई (Core CPI) में मामूली नरमी देखी गई:
-
वार्षिक आधार पर कोर मुद्रास्फीति अगस्त के 4.3% से घटकर 4.1% पर आ गई, जो सितंबर 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
-
मासिक आधार पर कोर सीपीआई में 0.3% की बढ़त दर्ज हुई।
-
कोर इन्फ्लेशन में गिरावट इस बात का संकेत है कि सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग गुड्स की कीमतों में अत्यधिक उछाल पर कुछ हद तक ब्रेक लगा है, लेकिन सेवा क्षेत्र में मजदूरी और किराए की लागत अभी भी फेड के सहज स्तर से काफी ऊपर बनी हुई है।
यूएस मुद्रास्फीति: प्रमुख आंकड़े एक नजर में
| पैरामीटर (Index Component) | वार्षिक बदलाव (YoY Change) | मासिक बदलाव (MoM Change) | मुख्य प्रभाव |
| हेडलाइन सीपीआई (All Items CPI) | 3.7% | +0.4% | अनुमान (3.6%) से अधिक, उच्च स्तर पर स्थिर |
| कोर सीपीआई (Core CPI - Ex Food & Energy) | 4.1% | +0.3% | दो साल के निचले स्तर पर, नरमी जारी |
| गैसोलीन इंडेक्स (Gasoline) | +3.0% (YoY) | +9.1% | ऊर्जा क्षेत्र में सबसे बड़ी मासिक छलांग |
| ऊर्जा सूचकांक (Energy Index) | -0.5% (YoY) | +5.6% | कच्चे तेल की तेजी से मासिक उछाल |
| शेल्टर इंडेक्स (आवास लागत) | +7.2% (YoY) | +0.6% | कोर बास्केट में सबसे मजबूत घटक |
फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति: 'हायर फॉर लॉन्गर' (Higher for Longer) का खतरा
इस डेटा ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के नीति-निर्माताओं के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है:
-
ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी का जोखिम: फेड पहले ही अपनी बेंचमार्क नीतिगत दरों को 22 साल के उच्चतम स्तर (5.25% - 5.50%) पर ले जा चुका है। यदि ऊर्जा और सेवाओं की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो फेड वर्ष के अंत से पहले दरों में 25 बेसिस प्वाइंट्स (bps) की एक और बढ़ोतरी करने पर विचार कर सकता है।
-
कटौती की संभावना टली: वॉल स्ट्रीट और वैश्विक वित्तीय बाजारों को उम्मीद थी कि 2024 के मध्य तक फेड ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला शुरू कर सकता है। लेकिन 3.7% की चिपचिपी महंगाई (Sticky Inflation) यह संदेश देती है कि दरें लंबे समय तक उच्च स्तर पर (Higher for Longer) बनी रहेंगी।
-
यूएस बॉन्ड यील्ड में तेजी: इस आंकड़े के आने के बाद अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में मजबूती देखी गई, जिससे डॉलर इंडेक्स (DXY) को भी समर्थन मिला।
भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर क्या होगा इसका असर?
अमेरिकी मुद्रास्फीति में आई तेजी का सीधा प्रभाव भारत सहित सभी उभरते बाजारों पर पड़ता है:
-
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली: अमेरिका में बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरें ऊंची रहने पर विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजारों से मुनाफावसूली कर सुरक्षित अमेरिकी डेट मार्केट की ओर रुख करते हैं, जिससे घरेलू शेयर बाजारों (Sensex और Nifty) में अस्थिरता बढ़ सकती है।
-
रुपये पर दबाव: मजबूत डॉलर के चलते भारतीय रुपये (INR) की विनिमय दर पर दबाव बना रह सकता है, जिससे भारत का कच्चा तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात महंगा होने का जोखिम रहता है।
-
आरबीआई (RBI) का रुख: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने हालिया मौद्रिक समीक्षा में रेपो रेट को 6.50% पर यथावत रखा है। हालांकि, यदि फेड लंबे समय तक दरों को ऊंचा रखता है और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें $90 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत में भी केंद्रीय बैंक को अपनी दरों में कटौती की योजना को लंबे समय के लिए टालना पड़ सकता है।