क्रिमिनल केस वाले नेताओं को मंत्री बनाने पर रोक लगाने की मांग खारिज

क्रिमिनल केस वाले नेताओं को मंत्री बनाने पर रोक लगाने की मांग खारिज

भारतीय राजनीति, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े एक बेहद अहम और बड़े मामले में देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका (PIL) को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें मांग की गई थी कि जिन नेताओं के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले (Criminal Cases) दर्ज हैं या अदालत में आरोप तय हो चुके हैं, उन्हें केंद्र और राज्यों में मंत्री पद पर नियुक्त करने से रोकने के लिए कड़े नियम बनाए जाएं। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत संविधान द्वारा तय किए गए शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं कर सकती। सर्वोच्च अदालत के इस बड़े फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर कानूनी विशेषज्ञों के बीच एक बार फिर राजनीति के अपराधीकरण और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने बताई बड़ी वजह: 'संविधान की सीमाओं और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकते'

मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में बेहद तर्कसंगत और संवैधानिक वजहों को सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 और अनुच्छेद 164 के तहत प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को अपनी कैबिनेट में मंत्रियों का चयन करने का पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त है। अदालत ने टिप्पणी की कि किसी जनप्रतिनिधि को मंत्री पद की शपथ दिलानी है या नहीं, यह पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) और जनता के द्वारा चुने गए शीर्ष नेतृत्व का निर्णय होता है। न्यायपालिका अपनी ओर से ऐसे नियम या गाइडलाइंस नहीं थोप सकती जो सीधे तौर पर जनप्रतिनिधित्व कानून (Representation of the People Act) और संवैधानिक प्रावधानों के दायरे को प्रभावित करें। अदालत का मानना है कि जब तक संसद खुद कानून बनाकर इस दिशा में कोई बदलाव नहीं करती, तब तक सुप्रीम कोर्ट नया कानून बनाने वाली संस्था के रूप में कार्य नहीं कर सकता।

राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता, लेकिन चुनावी जनादेश और नैतिकता को बताया जनता की जिम्मेदारी

हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने राजनीति में बढ़ते आपराधिक तत्वों पर चिंता जरूर जताई, लेकिन यह भी साफ किया कि इस दिशा में सुधार की मुख्य जिम्मेदारी विधायिका (Parliament) और देश की जागरूक जनता पर निर्भर करती है। बेंच ने कहा कि चुनाव लड़ने के लिए अयोग्यता (Disqualification) के कड़े नियम पहले से ही कानून में मौजूद हैं, जिसमें दो साल या उससे अधिक की सजा पाने वाले नेताओं की सदस्यता समाप्त हो जाती है। जब तक कोई व्यक्ति अदालत द्वारा दोषी साबित नहीं होता, तब तक उसे कानूनन निर्दोष माना जाता है और केवल एफआईआर (FIR) या आरोप तय होने के आधार पर संवैधानिक पद पर बैठने से रोकना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से साफ है कि चुनावी राजनीति और मंत्रिमंडल के गठन में किसे जगह मिलनी चाहिए और किसे नहीं, इसका अंतिम फैसला जनता के वोट और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक विवेक पर ही छोड़ा गया है।