'मैरिटल रेप को अपराध बनाना संसद का काम है, न्यायपालिका का नहीं': सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार का कड़ा रुख
भारतीय न्यायिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचे के सबसे संवेदनशील विषयों में से एक माने जाने वाले 'मैरिटल रेप' (Marital Rape) यानी वैवाहिक बलात्कार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। देश की सर्वोच्च अदालत में इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में रखा है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को दो टूक बताया कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध के दायरे में लाना या इससे जुड़े कानूनों में बदलाव करना पूरी तरह से देश की विधायिका (संसद) और कार्यपालिका का डोमेन है, न कि सर्वोच्च न्यायालय का। इस कानूनी और सामाजिक बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शादी के पवित्र रिश्ते के भीतर भी सहमति के अभाव को अपराध माना जाना चाहिए या फिर इसके लिए मौजूदा आपराधिक कानूनों के दायरे में ही समाधान तलाशा जाना चाहिए। देश भर की निगाहें इस समय सुप्रीम कोर्ट में चल रही इन महत्वपूर्ण और दूरगामी परिणामों वाली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट की विशेष बेंच तीन हफ्ते बाद करेगी मैरिटल रेप मामलों पर अंतिम सुनवाई
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की एक महत्वपूर्ण तीन-सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली तमाम याचिकाओं पर अब से ठीक तीन हफ्ते बाद बुधवार और गुरुवार को नियमित रूप से अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी। कोर्ट के समक्ष यह मुख्य कानूनी चुनौती भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद 2 की वैधता को लेकर है, जो कि पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में दिए गए मैरिटल रेप के अपवाद का ही संशोधित रूप है। मौजूदा कानूनी प्रावधान के अनुसार, यदि कोई वयस्क पुरुष अपनी बालिग पत्नी (यानी ऐसी पत्नी जिसकी आयु 18 वर्ष से कम न हो) के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध भी शारीरिक संबंध बनाता है, तो उसे कानूनी रूप से बलात्कार (Rape) की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इस कानूनी अपवाद को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं पिछले लंबे समय से अदालत में लंबित चली आ रही हैं, जिन पर अब अदालत ने ग्रीष्मकालीन या आगामी कार्यदिवसों में ठोस बहस का मन बनाया है।
'शादी का मतलब महिला की आजादी का खात्मा नहीं': जस्टिस जॉयमाल्य बागची की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने बेहद तार्किक और मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि शादी के रिश्ते के भीतर किसी महिला को उसकी बिना मर्जी और सहमति के जबरन यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो क्या वह महिला एक पीड़ित (Victim) नहीं है? जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतें हमेशा पीड़ितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं, और मुख्य सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें या देश का कानून इस तरह के कृत्य को बलात्कार की परिभाषा में शामिल करता है या नहीं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट टिप्पणी की कि विवाह संस्था का यह कतई अर्थ नहीं है कि किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उसकी गरिमा और उसकी शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया हो। अदालत ने कहा कि वह इस बात की गहराई से समीक्षा करेगी कि क्या मैरिटल रेप से जुड़ी वर्तमान कानूनी छूट के बावजूद किसी पीड़ित पत्नी द्वारा पति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं, और क्या यह छूट भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों के बिल्कुल अनुकूल है या नहीं।
याचिकाकर्ताओं की दलील: वैवाहिक बंधन किसी को भी शारीरिक हिंसा या अनाधिकार की छूट नहीं देता
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पक्ष रख रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी (Karuna Nandi) ने अपनी जोरदार दलीलें पेश करते हुए कहा कि यदि कोई पति अपनी ही पत्नी के साथ क्रूरता करता है या उसे गंभीर शारीरिक चोटें पहुंचाता है, तो वह केवल 'पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते' की आड़ में किसी भी प्रकार की कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि शादी का रिश्ता किसी भी व्यक्ति को इस बात का लाइसेंस नहीं देता है कि वह अपनी पत्नी की इच्छा या सहमति के बिना उसके साथ संबंध बनाए या उसे गंभीर शारीरिक व मानसिक नुकसान पहुंचाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून की नजर में हर नागरिक की देह की पवित्रता और उसका आत्म-सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, चाहे वह व्यक्ति किसी भी सामाजिक रिश्ते में क्यों न बंधा हुआ हो।
केंद्र सरकार का पुराना और अडिग रुख: मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाने के पक्ष में नहीं है सरकार
केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले में अपने पहले के रुख को दोहराते हुए कहा है कि वह मैरिटल रेप को एक अलग और नया आपराधिक अपराध बनाने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं है। सरकार का यह मानना है कि यदि वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध घोषित कर दिया जाता है, तो इससे भारतीय समाज में परिवार की संस्था और शादी के रिश्तों की स्थिरता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। सरकार के हलफनामे में यह भी कहा गया है कि वैवाहिक जीवन के भीतर यौन संबंधों से जुड़ी शिकायतों या विवादों को आम स्ट्रीट-क्राइम या सामान्य बलात्कार के अपराध के बराबर तौलने के बजाय, घरेलू हिंसा अधिनियम या अन्य मौजूदा वैधानिक प्रावधानों के दायरे में ही सुलझाया जाना चाहिए। याद रहे कि वर्ष 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर एक खंडित (बंटा हुआ) फैसला सुनाया था, जिसके बाद यह जटिल कानूनी विवाद अपील के रूप में सुप्रीम कोर्ट के पास पहुंचा था, और अब देश की सर्वोच्च अदालत इस पर अंतिम फैसला सुनाने की ओर अग्रसर है।