वाराणसी के घाटों पर उमड़ी 'मां की ममता'! बेटे की लंबी उम्र के लिए माताओं ने रखा सबसे कठिन जितिया व्रत

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वाराणसी | 15 सितंबर, 2025: "जब तक सूरज और चाँद रहेंगे, मेरे बेटे और बेटी का वास रहेगा!"... आज यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि काशी के कण-कण में गूंजती एक माँ की सच्ची प्रार्थना और तपस्या है। आज आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर शिव की नगरी वाराणसी में हज़ारों माताओं ने अपनी संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में से एक, जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत रखा।

यह सिर्फ़ एक व्रत नहीं, बल्कि माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और अटूट विश्वास का जीवंत उत्सव है। आज काशी के घाटों, मंदिरों और घरों में मातृत्व की यही शक्ति देखी जा सकती है।

24 घंटे की सबसे कठिन 'तपस्या'

यह व्रत दुनिया का सबसे कठिन व्रत माना जाता है, क्योंकि इसमें माताएँ पूरे 24 घंटे (निर्जला) तक बिना पानी पिए रहती हैं। सुबह 'ओठगन' की रस्म के बाद शुरू हुआ यह व्रत कल, 16 सितंबर को सूर्योदय के बाद पारण के साथ ही तोड़ा जाएगा। माताओं के इस त्याग और साहस को देखकर कोई भी नतमस्तक हो जाए।

भगवान जीमूतवाहन की पूजा

दिन भर के निर्जला व्रत के बाद, शाम होते ही वाराणसी के गली-मोहल्लों में जितिया व्रत की पूजा-अर्चना शुरू हो गई।

विशेष पूजा हुई: महिलाओं ने समूह बनाकर इस व्रत के देवता भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। उन्होंने मिट्टी से सियार और चील की मूर्तियाँ बनाईं, कुश से भगवान जीमूतवाहन की मूर्ति बनाई और फिर उन्हें सिंदूर, अक्षत और पुष्प अर्पित कर उनकी आरती उतारी।
व्रत की कथा सुनी: पूजा का सबसे महत्वपूर्ण भाग जितिया व्रत की कथा है। महिलाओं ने एक साथ बैठकर भगवान जीमूतवाहन की पावन कथा सुनी, जिसमें उन्होंने एक माँ के बेटे की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी थी।

ये सिर्फ़ एक पूजा नहीं, बल्कि इन लाखों माताओं का अपने बच्चों से एक वादा है कि वो उनकी सुरक्षा के लिए कोई भी कष्ट सहने को तैयार हैं। आज वाराणसी के घाटों पर माँ गंगा इसी 'माँ की ममता' की साक्षी बन रही थीं, जहाँ कई महिलाओं ने दीप जलाकर अपने बच्चों की खुशहाली की कामना की।