महिलाओं के खाते में हर महीने आ रहे हैं पैसे, लेकिन इस योजना का दूसरा पहलू आपको हैरान कर देगा

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आजकल देश के 12 राज्यों में सरकार सीधे महिलाओं के बैंक खाते में हर महीने नकद पैसे भेज रही है. मध्य प्रदेश की 'लाड़ली बहना योजना' हो या कर्नाटक की 'गृह लक्ष्मी योजना', इन जैसी स्कीमों के तहत लाखों महिलाओं को 1,000 से 1,500 रुपये की सीधी आर्थिक मदद मिल रही है. इसका मकसद साफ है - घर की महिला को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना. यह एक बहुत अच्छी पहल है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका एक दूसरा पहलू भी है?

खजाने पर 1.68 लाख करोड़ का भारी बोझ

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ये 12 राज्य मिलकर इस एक साल में इन योजनाओं पर 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च करने वाले हैं. यह रकम इतनी बड़ी है कि इससे कई बड़े प्रोजेक्ट पूरे हो सकते हैं. तीन साल पहले सिर्फ दो राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़कर 12 हो गई है.

इसका नतीजा यह हो रहा है कि इन 12 में से 6 राज्यों की हालत "आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया" वाली हो गई है. यानी उनकी कमाई से ज़्यादा उनका खर्च बढ़ गया है, जिससे वे वित्तीय घाटे का सामना कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर इन योजनाओं का खर्च हटा दिया जाए, तो कई राज्यों की आर्थिक सेहत काफी सुधर सकती है.

RBI ने भी बजाई खतरे की घंटी

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस बढ़ते चलन पर चिंता जताई है. RBI का कहना है कि महिलाओं, युवाओं या किसानों को दी जाने वाली सीधी नकद सहायता और सब्सिडी अगर इसी तरह बढ़ती रही, तो राज्यों के बजट पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. इससे सड़क, स्कूल, और अस्पताल जैसे विकास के कामों के लिए पैसा कम पड़ जाएगा.

क्या है आगे का रास्ता?

यह सच है कि इन योजनाओं से महिलाओं को घर चलाने और अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने में बड़ी मदद मिली है, और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि राज्यों को अपने खाली होते खजाने पर भी ध्यान देना होगा.

जरूरत इस बात की है कि सरकारें सशक्तिकरण और वित्तीय अनुशासन के बीच एक संतुलन बनाएं. ताकि महिलाओं को मिलने वाली मदद भी बंद न हो और राज्य की आर्थिक सेहत भी न बिगड़े.