Mokama Assembly Election : जब छोटे सरकार और युवा तुर्क हुए आमने-सामने कैसे जंग का मैदान बन गया मोकामा
News India Live, Digital Desk: Mokama Assembly Election : बिहार की राजनीति में मोकामा का नाम आते ही बंदूकें, बाहुबल और वर्चस्व की कहानियां खुद-ब-खुद जेहन में उतर आती हैं। यह वो इलाका है जहां चुनाव कभी बैलेट से ज्यादा 'बुलेट' की हनक पर लड़ा जाता रहा है। और 2025 का यह विधानसभा चुनाव भी इससे अलग नहीं है। इस बार मोकामा का सियासी अखाड़ा दो ऐसे बाहुबलियों की सीधी टक्कर से दहक रहा है, जिनके टकराव ने चुनाव को एक 'खूनी जंग' में तब्दील कर दिया है।
एक तरफ हैं जेल में बंद, लेकिन इलाके पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले 'छोटे सरकार' अनंत सिंह, जिनकी पत्नी नीलम देवी आरजेडी के टिकट पर मैदान में हैं। तो दूसरी तरफ हैं जेडीयू के कद्दावर नेता ललन सिंह के करीबी माने जाने वाले पीयूष कुमार।
कब और कैसे शुरू हुई यह 'जंग'?
चुनाव प्रचार के दौरान यह सियासी अदावत उस वक्त खूनी संघर्ष में बदल गई, जब पंडारक इलाके में अनंत सिंह के काफिले और पीयूष कुमार के समर्थक आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते दोनों गुटों के बीच कहासुनी गाली-गलौज और फिर मारपीट में बदल गई। हालात इतने बिगड़े कि बीच सड़क पर गोलियां चलने लगीं, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया।
यह सिर्फ एक चुनावी झड़प नहीं थी, बल्कि इलाके पर अपना दबदबा कायम करने की खुली जंग थी।
क्यों है मोकामा में इतनी तनातनी?
मोकामा की राजनीति को समझने के लिए यहां के बाहुबल और जातीय समीकरणों को समझना जरूरी है।
- अनंत सिंह का गढ़: अनंत सिंह पिछले कई दशकों से मोकामा की राजनीति का दूसरा नाम रहे हैं। जेल में रहने के बावजूद आज भी इलाके में उनकी 'छोटे सरकार' वाली छवि कायम है। उनके समर्थक उन्हें 'रॉबिनहुड' की तरह देखते हैं। उनके लिए मोकामा सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि उनकी 'इज्जत' का सवाल है।
- ललन सिंह की प्रतिष्ठा: दूसरी ओर, पीयूष कुमार को जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का पूरा समर्थन हासिल है। ललन सिंह भी इसी क्षेत्र से आते हैं और उनके लिए अनंत सिंह के इस अभेद्य किले को भेदना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। वह किसी भी कीमत पर मोकामा सीट जीतकर यह साबित करना चाहते हैं कि अब इलाके में अनंत सिंह का दौर खत्म हो चुका है।
- जाति का खेल और पुराना हिसाब: मोकामा में भूमिहार बनाम अन्य जातियों का समीकरण हमेशा से हावी रहा है। दोनों ही तरफ से इस जातीय समीकरण को साधने और एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश हो रही है। इसके अलावा, दोनों गुटों के बीच की पुरानी अदावतें भी इस चुनावी जंग में घी का काम कर रही हैं।
चुनाव आयोग ने इलाके में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी है और हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। लेकिन जमीन पर जो तनाव है, उसे देखकर स्थानीय लोगों को डर है कि मतदान के दिन तक यह चिंगारी कभी भी एक बड़े शोले में बदल सकती है। मोकामा में इस बार का चुनाव सिर्फ विधायक चुनने के लिए नहीं, बल्कि यह तय करने के लिए हो रहा है कि इलाके का अगला 'सरकार' कौन होगा।