Mission 2029: क्या ममता बनर्जी होंगी PM पद का चेहरा? 2026 के बंगाल चुनाव तय करेंगे भविष्य की राष्ट्रीय बिसात
News India Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ये चुनाव केवल राज्य की सत्ता के लिए नहीं, बल्कि ममता बनर्जी (दीदी) के राष्ट्रीय कद को पुनः स्थापित करने की लड़ाई भी हैं। यदि वे 2026 में चौथी बार सत्ता में वापसी करती हैं, तो 2029 में प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी 'इंडिया गठबंधन' (INDIA Alliance) के भीतर और भी मजबूत हो जाएगी।
ममता बनर्जी की दावेदारी के 3 मजबूत पक्ष:
क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में सबसे बड़ी ताकत: ममता बनर्जी ने 2021 और 2024 (लोकसभा) में भाजपा के विजय रथ को बंगाल में सफलतापूर्वक रोका है। वे विपक्ष की उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो सीधे प्रधानमंत्री मोदी को उनके गढ़ में चुनौती देने का माद्दा रखती हैं।
'बंगाल की बेटी' और महिला कार्ड: देश भर में महिला वोटरों के बीच ममता बनर्जी की लोकप्रियता (लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के कारण) उन्हें एक 'मास लीडर' के रूप में पेश करती है।
विपक्ष में स्वीकार्यता: गठबंधन के भीतर राहुल गांधी के बाद ममता बनर्जी ही ऐसा चेहरा हैं, जिनके पास शासन का लंबा अनुभव और एक समर्पित वोट बैंक है।
[Image showing Mamata Banerjee waving to the crowd with TMC and India Alliance flags in background]
2026 की जीत क्यों है 2029 के लिए अनिवार्य?
Zee News की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के चुनाव ममता बनर्जी के लिए एक 'एसिड टेस्ट' हैं:
अस्तित्व की लड़ाई: भाजपा ने इस बार 'पल्टानो दरकार' (बदलाव की जरूरत) का नारा दिया है। यदि टीएमसी (TMC) की सीटों में कमी आती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर उनकी 'नेगोशिएशन पावर' कमजोर हो सकती है।
भ्रष्टाचार के आरोप: हाल के वर्षों में भर्ती घोटाले और ईडी (ED) की कार्रवाई ने सरकार की छवि पर असर डाला है। 2026 की जीत इन आरोपों पर जनता की 'क्लीन चिट' मानी जाएगी।
राहुल गांधी बनाम ममता: विपक्षी गठबंधन में 'नंबर 1' की लड़ाई हमेशा बनी रहती है। 2026 की जीत ममता को राहुल गांधी के समकक्ष या उनसे आगे खड़ा कर सकती है।
भाजपा और कांग्रेस का रुख
भाजपा: भाजपा नेताओं का दावा है कि 2026 में बंगाल में उनकी सरकार बनेगी, जिससे ममता का 'पीएम बनने का सपना' वहीं खत्म हो जाएगा।
कांग्रेस: कांग्रेस अभी भी राहुल गांधी को ही चेहरा मानती है, लेकिन वे क्षेत्रीय सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति पर कायम हैं।