Meghalaya : यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज रेस में मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज ,500 साल तक मजबूत रहते हैं ये जीते-जागते पुल

Post

News India Live, Digital Desk: भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यहाँ की खासी और जयंतिया जनजातियों द्वारा रबर के पेड़ों की जड़ों से तैयार किए गए 'लिविंग रूट ब्रिज' (Living Root Bridges) को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) के रूप में स्थायी दर्जा देने के लिए आधिकारिक तौर पर नामांकित किया गया है। ये पुल न केवल पर्यटन का केंद्र हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ वास्तुकला (Sustainable Architecture) का सबसे बड़ा उदाहरण भी हैं।

क्या हैं लिविंग रूट ब्रिज? (The Living Engineering)

ये पुल किसी सीमेंट, लोहे या लकड़ी के लट्ठों से नहीं बने हैं, बल्कि 'फिकस इलास्टिका' (Ficus elastica) प्रजाति के रबर के पेड़ों की जड़ों को मोड़कर और आपस में गूंथकर बनाए जाते हैं।

निर्माण की प्रक्रिया: स्थानीय लोग बांस के ढांचे का उपयोग करके जड़ों को नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक बढ़ने के लिए 'गाइड' करते हैं।

समय: एक मजबूत पुल तैयार होने में 10 से 15 साल का समय लगता है।

क्यों हैं ये पुल इतने खास? (Key Features)

विशेषताविवरण
मजबूतीजैसे-जैसे पेड़ पुराना होता है, जड़ें और मजबूत होती जाती हैं। ये एक साथ 50 लोगों का वजन उठा सकते हैं।
जीवनकालएक औसत रूट ब्रिज 500 साल से अधिक समय तक जीवित रह सकता है।
इको-फ्रेंडलीये पुल बाढ़ और मूसलाधार बारिश के बावजूद नहीं टूटते, बल्कि पानी के संपर्क में आने से इनकी पकड़ और मजबूत होती है।
डबल डेकर ब्रिजचेरापूंजी (सोहरा) में स्थित 'उमशियांग डबल डेकर ब्रिज' दुनिया में अपनी तरह का इकलौता है।

यूनेस्को नामांकन का क्या होगा फायदा?

मेघालय के लगभग 72 गांवों में फैले इन पुलों को अगर यूनेस्को का दर्जा मिलता है, तो:

वैश्विक संरक्षण: इन पुलों के रखरखाव और संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय फंड और तकनीक उपलब्ध होगी।

पर्यटन को बढ़ावा: मेघालय के ग्रामीण इलाकों में इको-टूरिज्म बढ़ेगा, जिससे स्थानीय रोजगार में वृद्धि होगी।

वैज्ञानिक शोध: वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर सकेंगे कि कैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

चेरापूंजी के 'जीते-जागते' अजूबे

मेघालय का 'नोंग्रियाट' (Nongriat) गांव इन पुलों का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को करीब 3,000 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। स्थानीय खासी जनजाति के लोगों के लिए ये पुल केवल रास्ता नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पूर्वजों की विरासत का हिस्सा हैं। वे इन्हें 'जिंकेंग ज्री' (Jingkieng Jri) कहते हैं।

--Advertisement--