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April 30 2026 03:52 am

"मैम, अबॉर्शन कराना है"... 19 साल की लड़की के अगले शब्दों ने डॉक्टर के भी होश उड़ा दिए

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डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस में रोज न जाने कितने मरीजों से मिलते हैं। हर मरीज की अपनी एक कहानी होती है, अपनी एक तकलीफ होती है। लेकिन कुछ चेहरे और कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो डॉक्टरों के भी दिल-दिमाग पर हमेशा के लिए छप जाते हैं।

यह कहानी भी एक ऐसी ही मुलाकात की है, जिसे एक महिला डॉक्टर ने साझा किया।

कहानी कुछ यूं है कि एक दिन उनके क्लीनिक में 19-20 साल की एक लड़की आई। दिखने में स्मार्ट, मॉडर्न और आत्मविश्वास से भरी हुई। उसने बिना किसी झिझक के सीधे-सीधे कहा, "मैम, मैं लिव-इन रिलेशनशिप में रहती हूं और मुझे अबॉर्शन (गर्भपात) कराना है।"

डॉक्टर के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। उन्होंने профессионально सिर हिलाया और कागजी कार्रवाई शुरू करने लगीं। उन्होंने सोचा, शायद यह कोई आम केस होगा, जहां लड़की अभी शादी के लिए तैयार नहीं है या अपने करियर पर ध्यान देना चाहती है।

लेकिन असली कहानी और असली ‘झटका’ तो अब शुरू होना था।

जब डॉक्टर ने उससे कुछ और सवाल पूछे, तो लड़की ने बड़ी ही सहजता और लापरवाही से जो बताया, उसे सुनकर डॉक्टर के भी हाथ कांप गए। लड़की ने कहा कि यह उसका ‘तीसरा’ अबॉर्शन है!

सिर्फ 19 साल की उम्र में तीसरा अबॉर्शन... यह सुनकर डॉक्टर हैरान थीं। पर उनकी हैरानी तब और बढ़ गई, जब लड़की ने कहा, "पिल्स (गर्भनिरोधक गोलियां) रोज-रोज याद रखना झंझट लगता है... यह (अबॉर्शन) सबसे आसान और सेफ तरीका लगता है।"

यह बात डॉक्टर के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। उन्होंने देखा कि एक 19 साल की लड़की, जिसे गूगल और यूट्यूब से अधूरी और खतरनाक जानकारी मिल रही है, वह अबॉर्शन जैसी एक गंभीर, दर्दनाक और भावनात्मक प्रक्रिया को सिरदर्द की गोली खाने जितना आसान समझ रही है। उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि बार-बार ऐसा करना उसके शरीर, उसके भविष्य में मां बनने की क्षमता और उसकी मानसिक सेहत को हमेशा के लिए बर्बाद कर सकता है।

यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है, बल्कि हमारी उस युवा पीढ़ी की एक डरावनी तस्वीर है, जो ‘स्मार्ट’ तो है, लेकिन ‘समझदार’ नहीं बन पा रही। यह उस समाज की कहानी है जहां यौन शिक्षा (Sex Education) के बारे में खुलकर बात करना आज भी एक टैबू है, और जिसका नतीजा ऐसी दुखद और खतरनाक स्थितियों के रूप में सामने आता है।

उस दिन डॉक्टर के मन में सिर्फ एक सवाल था - क्या शरीर और भावनाओं पर पड़ने वाले इस गहरे घाव को हम सिर्फ एक मामूली ‘प्रोसीजर’ समझकर अनदेखा कर सकते हैं?