Maharashtra Politics : मैं थक चुका हूं, अब कुछ नहीं चाहिए, निधन से पहले अजित पवार ने दोस्त से साझा किया था अपना दर्द
News India Live, Digital Desk: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार को विमान हादसे में निधन केवल एक राजनीतिक क्षति नहीं है, बल्कि एक ऐसे नेता के सफर का अंत है जो पिछले कुछ समय से मानसिक रूप से काफी आहत थे। उनके सबसे करीबी मित्र और बारामती विद्या प्रतिष्ठान के ट्रस्टी किरण गूजर ने अजित दादा के अंतिम दिनों और उनकी आखिरी बातचीत को लेकर जो खुलासे किए हैं, वे बेहद भावुक करने वाले हैं।
किरण गूजर वही शख्स हैं जिन्होंने 1984 में अजित पवार को पहला चुनाव लड़ने के लिए राजी किया था। उनकी आंखों के सामने ही दादा का विमान क्रैश हुआ।
निधन से 5 दिन पहले की वो आखिरी मुलाकात
किरण गूजर ने बताया कि अपनी मौत से महज पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे अपनी थकान और राजनीति से ऊब जाने की बात कही थी।
आखिरी डिनर: गूजर ने बताया, "पांच दिन पहले हम दोनों बाहर घूमने गए थे। हमने साथ डिनर किया। अजित दादा ने मुझसे कहा था किरण, मैं अब बोर हो चुका हूं, मैं तंग आ गया हूं। अब मुझे ये सब (राजनीति) नहीं चाहिए। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह हाल ही में ऐसा क्यों कह रहे थे।"
हार का दर्द: लोकसभा चुनाव में मिली हार ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था। वे बार-बार कहते थे, "मैं दिन-रात मेहनत कर रहा हूं, फिर भी मुझे 'थप्पड़' (जनता की नाराजगी) क्यों पड़ रहे हैं?"
ईश्वर के प्रति बदला था नजरिया
अजित पवार को राजनीति में एक सख्त और रूखे स्वभाव के नेता के तौर पर जाना जाता था, लेकिन किरण गूजर के अनुसार उम्र के साथ वे काफी संवेदनशील हो गए थे।
बचपन का आघात: शुरुआत में अजित पवार भगवान को ज्यादा नहीं मानते थे। वे कहते थे, "भगवान ने मेरा क्या बिगाड़ा है? पिता बचपन में चले गए, परिवार ने इतनी मुश्किलें देखीं।"
बदलाव: किरण गूजर ने गौर किया कि हाल के दिनों में उनका झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ा था। वे अंधविश्वासी नहीं थे, लेकिन उनका ईश्वर पर भरोसा जाग उठा था।
"आंखों के सामने राख हो गया दोस्त"
विमान हादसे के वक्त किरण गूजर खुद एयरपोर्ट पर अजित दादा का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए कहा:"प्लेन में चढ़ने से पहले दादा का मुझे फोन आया था। उन्होंने कहा कि मैं निकल रहा हूं। मैं उन्हें लेने एयरपोर्ट गया और मेरी आंखों के सामने ही प्लेन क्रैश हो गया। जब उनकी बॉडी को कार में रखा जा रहा था, तब भी मुझे लग रहा था कि शायद यह कोई बुरा सपना है।"
1984 से शुरू हुआ था साथ
किरण गूजर और अजित पवार का रिश्ता चार दशक पुराना था।
1984 में जब छत्रपति सहकारी चीनी कारखाने का चुनाव था, तब अजित पवार राजनीति में नहीं आना चाहते थे। वे अपना घर और दुनिया देखना चाहते थे।
किरण गूजर के प्रोत्साहन के बाद ही उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अजित पवार के निधन ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरना नामुमकिन है। उनके करीबी सहयोगियों का कहना है कि वे एक ऐसे योद्धा थे जो बाहर से सख्त लेकिन अंदर से अपनों के लिए बहुत नरम थे।