पाकिस्तान का साथ छोड़ अब भारत की शरण में यह मुस्लिम देश, ऑपरेशन सिंदूर की कड़वाहट भुलाकर दोस्ती का नया आगाज
News India Live, Digital Desk: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। कभी 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान का खुलकर साथ देने वाला मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान अब भारत के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने में जुट गया है। बाकू में हाल ही में हुई उच्च स्तरीय वार्ताओं के बाद यह साफ हो गया है कि अजरबैजान अब पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़कर भारत के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी बढ़ाना चाहता है। यह बदलाव न केवल दक्षिण एशिया बल्कि मध्य एशिया की राजनीति के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।
क्या था 'ऑपरेशन सिंदूर' और क्यों बिगड़े थे रिश्ते?
भारत और अजरबैजान के रिश्तों में खटास की एक बड़ी वजह 'ऑपरेशन सिंदूर' और कश्मीर मुद्दे पर अजरबैजान का पाकिस्तान के प्रति झुकाव रहा है। पाकिस्तान, तुर्की और अजरबैजान के 'थ्री ब्रदर्स' (Three Brothers) गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार भारत के खिलाफ स्टैंड लिया था। अजरबैजान ने अर्मेनिया के साथ अपने युद्ध के दौरान पाकिस्तान से सैन्य और नैतिक समर्थन प्राप्त किया था, जिसके बदले में उसने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के नैरेटिव का समर्थन किया। हालांकि, बदलते वैश्विक समीकरणों ने अब बाकू को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
पाकिस्तान से मोहभंग और भारत से बढ़ती नजदीकियां
विशेषज्ञों का मानना है कि अजरबैजान को अब समझ आ गया है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और उसकी वैश्विक साख लगातार गिर रही है। दूसरी ओर, भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। अजरबैजान को अपनी ऊर्जा (तेल और गैस) के लिए एक बड़े बाजार की जरूरत है, और भारत से बेहतर विकल्प उसे नजर नहीं आ रहा। यही कारण है कि बाकू ने अब 'पाकिस्तान कार्ड' को छोड़कर भारत के साथ व्यापारिक और निवेश समझौतों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है।
शांतिदूत बनने की फिराक में चीन, भारत को घेरने की रणनीति?
अजरबैजान और भारत के बीच इस 'रिसेट' के पीछे एक और बड़ा पहलू चीन का है। चीन इस समय मध्य एशिया और खाड़ी देशों के बीच 'शांतिदूत' बनने का नाटक कर रहा है। हाल ही में चीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच के विवाद को सुलझाने की कोशिश की है, जिसका असल मकसद भारत को रणनीतिक रूप से घेरना है। अजरबैजान के साथ भारत की बढ़ती दोस्ती चीन के इस 'घेराबंदी प्लान' (String of Pearls) को कमजोर करने का काम करेगी। भारत के लिए अजरबैजान के साथ संबंध सुधारना INSTC (International North-South Transport Corridor) के लिए भी संजीवनी साबित होगा।
नई शुरुआत: रक्षा से लेकर ऊर्जा तक होगा सहयोग
बाकू में हुई हालिया बैठकों में दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर विस्तार से चर्चा हुई है। भारत अब अजरबैजान को केवल एक तेल निर्यातक देश के रूप में नहीं, बल्कि यूरेशिया के प्रवेश द्वार के रूप में देख रहा है। यदि अजरबैजान कश्मीर मुद्दे पर अपनी निष्पक्षता बनाए रखता है, तो भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच रक्षा समझौतों की भी उम्मीद जताई जा रही है, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।