लालू का अतिम फैसला नीतीश के लिए हमेशा के लिए बंद हुए दरवाजे, बिहार की सियासत में भूचाल
News India Live, Digital Desk: बिहार की राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी के समीकरण बदलने के लिए जानी जाती है, लेकिन इस बार राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने भविष्य के सभी राजनीतिक गठजोड़ की अटकलों पर फिलहाल विराम लगा दिया है। बार-बार पाला बदलने के लिए मशहूर नीतीश कुमार के लिए लालू यादव ने अपने दरवाजे पूरी तरह से बंद करने का ऐलान कर दिया है।
एक हालिया इंटरव्यू में जब लालू यादव से यह सवाल पूछा गया कि अगर भविष्य में INDIA गठबंधन को सरकार बनाने के लिए नीतीश कुमार के समर्थन की जरूरत पड़ी, तो क्या वे उन्हें स्वीकार करेंगे? इस पर लालू ने बिना एक पल की देरी किए साफ और सख्त लहजे में कहा, "अब हम नीतीश कुमार को स्वीकार नहीं करेंगे।"
"उन पर से भरोसा पूरी तरह खत्म हो गया है"
लालू यादव का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस धोखे की टीस है जो उन्हें और उनके बेटे तेजस्वी यादव को तब मिली, जब नीतीश कुमार अचानक महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे। लालू ने स्पष्ट किया कि अब उनका नीतीश कुमार से किसी भी तरह का कोई संपर्क नहीं है और न ही वे भविष्य में रखना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने न केवल उस जनादेश का अपमान किया जो 2022 में बीजेपी के खिलाफ मिला था, बल्कि उन्होंने विपक्ष की एकता की उस मुहिम (INDIA गठबंधन) की भी पीठ में छुरा घोंपा, जिसके वे खुद एक प्रमुख सूत्रधार थे।
कब-कब पलटे नीतीश?
नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर गठबंधनों को बदलने के लिए जाना जाता है।
- 2017: महागठबंधन (आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस) की सरकार गिराकर एनडीए में चले गए।
- अगस्त 2022: एनडीए छोड़कर फिर से आरजेडी के साथ महागठबंधन में लौट आए।
- जनवरी 2024: एक बार फिर महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए का दामन थाम लिया।
उनके इसी राजनीतिक चरित्र के कारण उन्हें "पलटूराम" जैसे नामों से भी पुकारा जाता रहा है।
दरवाजे "खुले" से "हमेशा के लिए बंद" तक का सफर
दिलचस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले लालू यादव ने ही यह कहकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी कि नीतीश के लिए "दरवाजे हमेशा खुले हैं।" लेकिन अब उनका ताजा बयान ठीक 180 डिग्री उलट है। इससे साफ संकेत मिलता है कि आरजेडी अब किसी भी सूरत में नीतीश कुमार पर दोबारा भरोसा करने के मूड में नहीं है। लालू और उनकी पार्टी यह समझ चुके हैं कि नीतीश कुमार की राजनीति में स्थिरता की कोई गारंटी नहीं है और उनके साथ का मतलब हमेशा एक राजनीतिक अनिश्चितता को न्योता देना है।
लालू का यह अंतिम और निर्णायक बयान बिहार की राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है। अब यह देखना होगा कि वक्त और जरूरत के हिसाब से यह "हमेशा के लिए बंद हुए दरवाजे" क्या वाकई बंद रहते हैं या राजनीति की कोई नई हवा इन्हें फिर से खटखटाने पर मजबूर कर देगी।