हिमालय में बर्फबारी की कमी से मचेगा हाहाकार गंगा-यमुना का अस्तित्व खतरे में, 2026 में जल संकट की भीषण चेतावनी

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News India Live, Digital Desk : भारत का 'वाटर टावर' कहा जाने वाला हिमालय इस समय एक अजीबोगरीब मौसमी घटनाक्रम से गुजर रहा है। साल 2026 की सर्दियों में बर्फबारी की देरी और कम मात्रा ने भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इसका सीधा असर गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदियों के प्रवाह पर पड़ने वाला है।

1. 'लेट स्नोफॉल' का ग्लेशियरों पर प्रभाव

आमतौर पर दिसंबर और जनवरी में होने वाली भारी बर्फबारी ग्लेशियरों को रिचार्ज करने का काम करती है।

पिघलने की रफ्तार: समय पर बर्फ न गिरने के कारण पुराने ग्लेशियर सीधे सूर्य की किरणों के संपर्क में आ रहे हैं, जिससे उनके पिघलने की दर 20-30% तक बढ़ गई है।

नेगेटिव मास बैलेंस: वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, ग्लेशियरों का 'मास बैलेंस' बिगड़ रहा है, यानी जितनी बर्फ जमा नहीं हो रही, उससे कहीं ज्यादा पुरानी बर्फ पिघल रही है।

2. गंगा और यमुना पर मंडराता संकट

उत्तर भारत की कृषि और पेयजल व्यवस्था पूरी तरह इन नदियों पर निर्भर है।

फ्लो में कमी: यदि फरवरी और मार्च में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई, तो गर्मी के मौसम में इन नदियों के जलस्तर में 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा सकती है।

पेयजल की किल्लत: दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के शहरों में मई-जून के दौरान पानी की भारी किल्लत हो सकती है, क्योंकि नदियों में 'बेस फ्लो' कम हो जाएगा।

3. 'अल नीनो' और वेस्टर्न डिस्टरबेंस का खेल

इस साल बर्फबारी में देरी के पीछे मुख्य कारण कमजोर पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) को माना जा रहा है।

तापमान में वृद्धि: हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में भी औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है।

विंड पैटर्न: हवाओं के बदलते पैटर्न के कारण नमी युक्त हवाएं हिमालय तक पहुँचने से पहले ही कमजोर पड़ रही हैं।

4. खेती और बिजली उत्पादन पर असर

सेब की खेती: हिमाचल और कश्मीर में सेब के बागानों को 'चिलिंग ऑवर्स' (बर्फ के नीचे रहने का समय) नहीं मिल पा रहा है, जिससे उत्पादन घटने की आशंका है।

हाइड्रो पावर: नदियों में पानी कम होने से बिजली उत्पादन (Hydropower generation) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे बिजली संकट गहरा सकता है