शिव संग शनि देव की कृपा पाने का दिन, जानें अक्टूबर में कब है शनि प्रदोष व्रत, पूजा विधि और कथा
News India Live, Digital Desk: भगवान शिव, जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है, अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं. उनकी पूजा के लिए हर दिन खास है, लेकिन प्रदोष व्रत का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यह व्रत हर महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है. जब यह त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो इसका महत्व और भी कई गुना बढ़ जाता है और इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है.
यह व्रत भगवान शिव के साथ-साथ न्याय के देवता शनि देव का आशीर्वाद पाने के लिए भी सबसे उत्तम दिन माना जाता है. मान्यता है कि जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसकी कुंडली से शनि के अशुभ प्रभाव, जैसे साढ़ेसाती या ढैय्या का असर कम हो जाता है और उसे हर कार्य में सफलता मिलती है.
आइए जानते हैं साल 2025 के अक्टूबर महीने में शनि प्रदोष व्रत कब है, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और इस व्रत की चमत्कारी कथा क्या है.
अक्टूबर 2025 में शनि प्रदोष व्रत की तारीख और मुहूर्त
- शनि प्रदोष व्रत की तारीख: 18 अक्टूबर, 2025, दिन शनिवार
- कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि की शुरुआत: 18 अक्टूबर, 2025 को दोपहर 01:21 बजे से
- कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि की समाप्ति: 19 अक्टूबर, 2025 को दोपहर 12:59 बजे पर
- पूजा का शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल): 18 अक्टूबर, शाम 05:47 बजे से रात 08:20 बजे तक
शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था. वह बहुत दयालु और धर्मात्मा था. उसके जीवन में धन-वैभव की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी एक ही पीड़ा थी कि उसकी कोई संतान नहीं थी. संतान की इच्छा में वह और उसकी पत्नी हर प्रदोष का व्रत रखते थे.
उनके पड़ोस में एक गरीब ब्राह्मण विधवा अपनी बहू के साथ रहती थी, जो बहुत सुशील और संस्कारी थी. एक दिन व्यापारी की पत्नी ने उस बहू के लक्षणों को देखकर अनुमान लगाया कि वह गर्भवती है. उसने यह बात अपने पति को बताई और बहू को अपने घर ले आए. उन्होंने उसकी खूब सेवा की. कुछ समय बाद, बहू ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया.
व्यापारी ने उस बच्चे को अपना ही मानकर पाला. जब लड़का बड़ा हुआ तो व्यापारी ने उसकी शादी तय कर दी. शादी से ठीक पहले भगवान शिव व्यापारी के सपने में आए और बोले, "तुमने उस बच्चे को अपना मानकर पाला है, लेकिन सच यह है कि उसकी मृत्यु का योग है." यह सुनकर व्यापारी घबरा गया. भगवान शिव ने उसे शनि प्रदोष का व्रत करने की सलाह दी.
व्यापारी ने पूरी श्रद्धा से शनि प्रदोष का व्रत किया. जब यमदूत उस बालक के प्राण लेने आए, तो भगवान शिव स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट हो गए और यमदूतों को वापस लौटा दिया. भगवान शिव और शनि देव की कृपा से उस बालक को लंबी आयु का वरदान मिला. मान्यता है कि तभी से शनि प्रदोष व्रत का महत्व और भी बढ़ गया.
शनि प्रदोष व्रत की सरल पूजा विधि
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें.
- भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें.
- दिनभर फलाहार पर रहें और मन में "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करते रहें.
- शाम को प्रदोष काल के मुहूर्त में दोबारा स्नान करके पूजा की तैयारी करें.
- शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें.
- इसके बाद भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद चंदन और फूल अर्पित करें.
- एक घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं.
- व्रत कथा पढ़ें और अंत में शिव चालीसा और शिवजी की आरती करें.
- पूजा के बाद प्रसाद बांटें और फिर अपना व्रत खोलें.
यह व्रत न केवल शनि दोष से मुक्ति दिलाता है, बल्कि संतान प्राप्ति, नौकरी में तरक्की और हर मनोकामना की पूर्ति के लिए भी उत्तम माना जाता है.