धर्मांतरण के खिलाफ क्यों कराया था मुंडन और क्या भू-माफियाओं से लड़ाई पड़ी भारी
झारखंड की राजनीति और सामाजिक गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली और दुखद खबर सामने आई है, जिसने पूरे राज्य के प्रशासनिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों की मुखर पैरोकार तथा केंद्रीय सरना समिति की पूर्व उपाध्यक्ष रहीं निशा भगत अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी संदेहास्पद मौत के बाद से पूरे झारखंड में राजनीतिक और सामाजिक भूचाल आ गया है। मौत से ठीक पहले निशा भगत ने सोशल मीडिया पर एक लाइव वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने सिस्टम, स्थानीय प्रशासन और भू-माफियाओं पर गंभीर मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। इस घटना के सामने आने के बाद से ही उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों—खासकर धर्मांतरण, डीलिस्टिंग की मांग और भू-माफियाओं के खिलाफ छेड़ी गई जंग—पर एक बार फिर तीव्र बहस छिड़ गई है।
आखिर क्यों कराया था निशा भगत ने अपना मुंडन? धर्मांतरण और डीलिस्टिंग के खिलाफ छेड़ा था बड़ा आंदोलन
निशा भगत पिछले कुछ समय से अपने एक खास विरोध प्रदर्शन को लेकर देश भर की सुर्खियों में आई थीं। आदिवासी समाज की संस्कृति, रीति-रिवाजों और पहचान को बचाने के लिए उन्होंने कुछ महीने पहले सार्वजनिक रूप से अपना सिर मुंडवा लिया था। उनका कड़ा तर्क था कि जिन आदिवासियों ने अपना मूल धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपना लिया है, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर (डीलिस्टिंग) किया जाना चाहिए। निशा भगत का यह मानना था कि धर्म बदल चुके लोग आदिवासी आरक्षण और अन्य संवैधानिक सुविधाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं, जिससे वास्तव में जमीन से जुड़े मूलनिवासी आदिवासियों के अधिकारों का हनन हो रहा है। सरना धर्म कोड को आधिकारिक मान्यता दिलाने और सीएनटी-एसपीटी एक्ट की रक्षा के लिए वे पूरी ताकत से मैदान में उतरी थीं। उनके इस मुखर और बेबाक रवैये के कारण वे लगातार वैचारिक विरोधियों के निशाने पर आ गई थीं और उन्हें समाज के भीतर और बाहर भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था।
क्या भू-माफियाओं और सिस्टम के खिलाफ लंबी लड़ाई बन गई उनकी मौत की वजह? परिवार ने लगाए गंभीर आरोप
निशा भगत के पिता और उनके करीबियों द्वारा थाने में दर्ज कराई गई लिखित शिकायत में स्पष्ट आरोप लगाया गया है कि कुछ भू-माफिया और खास लोग लगातार उनकी बेटी को मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। उनके चरित्र पर लांछन लगाने और घर से बाहर आने-जाने के दौरान उन्हें भयभीत करने के प्रयास किए जा रहे थे। अपने आखिरी फेसबुक लाइव के दौरान निशा भगत ने बेहद भावुक होकर कहा था कि वे समाज के लिए लड़ते-लड़ते थक चुकी हैं और सिस्टम तथा भू-माफियाओं के दबाव के आगे आज एक मजबूत लड़की हार गई है। इस हाई-प्रोफाइल मामले के सामने आने के बाद राज्य के विपक्षी दलों और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने हेमंत सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस प्रशासन ने मजिस्ट्रेट की निगरानी में शव का पोस्टमार्टम करवाकर मामले की विस्तृत जांच शुरू कर दी है, लेकिन इस घटना ने यह सवाल छोड़ दिया है कि क्या सामाजिक न्याय और जनहित की लड़ाई लड़ने वाले जांबाज लोग सिस्टम और भू-माफियाओं के चंगुल में यूं ही दम तोड़ते रहेंगे।