मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बयान पर सियासी भूचाल: सांसद निशिकांत ने कसा तीखा तंज
देश की राजनीति में चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच बयानों का दौर हमेशा से गरमाया रहता है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग और बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। झारखंड की गोड्डा लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के फायरब्रांड और बेबाक सांसद निशिकांत दुबे (Nishikant Dubey) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और उनके बयानों पर तीखा हमला बोला है। निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से मुख्य निर्वाचन आयुक्त को 'अंतर्यामी' की संज्ञा देते हुए एक ऐसा विवादास्पद सवाल पूछ लिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है।
सांसद निशिकांत दुबे ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के एक कथित बयान का हवाला देते हुए तंज कसा कि क्या चुनाव आयोग के पास कोई ऐसी अलौकिक शक्ति आ गई है जिससे यह पता लगाया जा सके कि देश के 13.5 करोड़ मतदाता किसकी तरफ झुके हैं या कौन असल में किस पार्टी का वोटर है? उनके इस बयान के बाद से विपक्षी दलों को भी बैठे-बिठाए सरकार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का एक बड़ा मौका मिल गया है। यह पूरा मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है।
#1 क्या है पूरा मामला? किस बयान को लेकर आमने-सामने आए निशिकांत दुबे और चुनाव आयोग?
हाल के दिनों में चुनाव सुधार, मतदाता सूची के पुनरीक्षण (Voter List Revision) और पारदर्शी चुनाव प्रक्रियाओं को लेकर चुनाव आयोग की तरफ से कुछ दिशा-निर्देश और बयान सामने आए थे। इन्हीं चर्चाओं के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए निशिकांत दुबे ने यह आक्रामक रुख अपनाया है। सांसद का कहना है कि जमीनी स्तर की चुनावी वास्तविकताओं और आंकड़ों को समझे बिना इस प्रकार की टिप्पणियां करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है।
निशिकांत दुबे ने अपने चिर-परिचित अंदाज में सवाल उठाते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में, जहाँ 13.5 करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत हैं, किसी भी व्यक्ति या संस्था के लिए यह दावा करना कि वह यह जानता है कि फलां मतदाता का आंतरिक झुकाव किस राजनीतिक दल की ओर है, पूरी तरह से अतार्किक है। उन्होंने कहा कि मतदाता का विवेक गुप्त होता है और ईवीएम या मतपेटी खुलने से पहले कोई भी 'अंतर्यामी' बनकर यह तय नहीं कर सकता कि असली वोटर कौन है और फर्जी कौन।
#1 "13.5 करोड़ की आत्मा में घुसकर": सांसद के इस मेटाफोरिक बयान से गरमाई सियासत
निशिकांत दुबे का यह बयान कि क्या चुनाव आयोग ने "13.5 करोड़ की आत्मा में घुसकर" यह जान लिया है कि वे बीजेपी के असली वोटर हैं या नहीं, अब सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है। उनके इस तंजिया और तीखे शब्दों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है। जानकारों का मानना है कि सांसद का यह बयान सीधे तौर पर उन दावों पर कटाक्ष था जो अक्सर चुनावी विश्लेषक या प्रशासनिक अधिकारी जनता के मूड को लेकर करते हैं।
इस बयान के सामने आते ही विपक्षी दलों के नेताओं ने भी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि जब सत्ताधारी दल के अपने ही सांसद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और बयानों पर इस तरह के सवाल खड़े करने लगे हैं, तो इससे यह साफ जाहिर होता है कि संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर भीतरखाने किस तरह की असहजता बनी हुई है। हालांकि, बीजेपी के अन्य नेताओं ने अभी तक इस बयान पर कोई आधिकारिक रूप से बड़ा पल्ला झाड़ने वाला बयान नहीं दिया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
#1 चुनाव आयोग और राजनेताओं के बीच बढ़ती तनातनी का क्या होगा असर?
भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग के कंधों पर है, और चुनाव आयोग समय-समय पर अपनी पारदर्शिता साबित करने के लिए विभिन्न कदम उठाता रहता है। लेकिन जब राजनीति से जुड़े लोग आयोग के बयानों को इस तरह की राजनीतिक धार देने लगते हैं, तो संस्था की तटस्थता को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा हो जाते हैं। निशिकांत दुबे अपने बयानों के जरिए हमेशा से मुखर रहे हैं और वे अपने संसदीय क्षेत्र के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर भी खुलकर अपनी बात रखते आए हैं।
इस ताजा प्रकरण ने एक बार फिर से यह बहस छेड़ दी है कि क्या जनप्रतिनिधियों को संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों की व्यक्तिगत शैली या बयानों पर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणियां करनी चाहिए या नहीं। आने वाले दिनों में संसद के सत्र या चुनावी रैलियों के दौरान इस मुद्दे के और अधिक तूल पकड़ने की पूरी संभावना है, जहाँ विपक्ष इस बयान को आधार बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
#1 सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग: जनता और समर्थकों की प्रतिक्रियाएं
जैसे ही निशिकांत दुबे का यह बयान मीडिया और इंटरनेट पर वायरल हुआ, सोशल मीडिया यूजर्स दो गुटों में बंट गए। एक तरफ जहां उनके समर्थकों का मानना है कि वे हमेशा जनता की आवाज और जमीनी सच्चाई को बिना किसी डर के सामने रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि एक सांसद को संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का ध्यान रखते हुए अपनी भाषा का चयन करना चाहिए। इस पूरी राजनीतिक उठापटक के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग की तरफ से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं।