120 साल पहले बस सेवा से पहले मिलती थी रेल यात्रा की सुविधा
आज के इस आधुनिक और रफ्तार भरे दौर में जब हमें राजधानी दिल्ली, कोलकाता या देश के किसी भी हिस्से में जाना होता है, तो हम कुछ ही घंटों में फ्लाइट, वंदे भारत ट्रेन या लग्जरी एक्सप्रेसवे के जरिए सफर तय कर लेते हैं। लेकिन जरा सोचिए कि आज से ठीक 120 साल पहले यानी बीसवीं सदी की शुरुआत में जब देश में न तो पक्की सड़कें थीं, न बसें चलती थीं और न ही आज की तरह हाई-स्पीड गाड़ियां उपलब्ध थीं, तब झारखंड की राजधानी रांची और आसपास के इलाकों से लोग दिल्ली या अन्य बड़े महानगरों की यात्रा कैसे करते होंगे? इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मोटर वाहन या बस सेवा शुरू होने से बहुत पहले लोगों को लंबी दूरियों के लिए या तो रेल पटरियों का सहारा लेना पड़ता था या फिर मीलों का सफर पैदल और बैलगाड़ियों के जरिए तय करना पड़ता था। रांची के शुरुआती परिवहन इतिहास और पुराने बुजुर्गों की यादों में दबी इस दिलचस्प दास्तान को जानकर हर कोई हैरान रह जाता है कि तब एक शहर से दूसरे शहर जाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।
#1. 120 साल पहले कैसा था रांची का परिवहन ढांचा? जब बसें नहीं, बैलगाड़ियां और पैदल चलना था मुख्य जरिया
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में छोटा नागपुर पठार और रांची का भौगोलिक क्षेत्र काफी बीहड़, जंगलों से घिरा और दुर्गम माना जाता था। उस दौर में सड़कों का नामोनिशान नहीं था, और न ही आज की तरह सार्वजनिक बस सेवाएं हुआ करती थीं। ब्रिटिश काल के दौरान जब प्रशासनिक जरूरतें बढ़ीं, तब जाकर रांची को बाहरी दुनिया से जोड़ने के प्रयास शुरू हुए। आम जनता और स्थानीय व्यापारी एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए पूरी तरह पैदल यात्रा करने, पालकी, घोड़ों या फिर लकड़ी के पहियों वाली बैलगाड़ियों पर निर्भर रहते थे। रांची से छोटे-मोटे कस्बों या गांवों तक पहुंचने में ही कई-कई दिन बीत जाते थे, और यदि किसी को सुदूर इलाकों की यात्रा करनी होती थी, तो सफर महीनों में तय होता था।
#1. बस सेवा आने से पहले रेल यात्रा बनी जीवनरेखा: जानिए रांची में कैसे शुरू हुआ ट्रेन का सफर
रांची के लोगों के लिए परिवहन के क्षेत्र में सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव तब आया जब इस क्षेत्र को रेलवे नेटवर्क से जोड़ा गया। सड़कों और बसों के आने से काफी पहले अंग्रेजों के शासनकाल में कलकत्ता और अन्य व्यापारिक केंद्रों से माल ढुलाई और प्रशासनिक आवाजाही के लिए रेल पटरियों का जाल बिछाया जाना शुरू हुआ था। छोटा नागपुर के रास्ते बंगाल और बिहार को जोड़ने वाली ट्रेनें जब पटरियों पर उतरीं, तब लोगों को पहली बार लंबी दूरी की यात्रा में बड़ी राहत मिली। रांची और लोहरदगा के बीच नैरो गेज ट्रेन सेवा की शुरुआत ने स्थानीय निवासियों के जीवन को आसान बना दिया। दिल्ली या कलकत्ता जाने वाले लोग पहले स्थानीय ट्रेनों के जरिए मुख्य जंक्शनों तक पहुंचते थे और वहां से इंपीरियल मेल या अन्य एक्सप्रेस ट्रेनों के माध्यम से अपनी मंजिल की ओर रवाना होते थे।
#1. रांची से दिल्ली और कोलकाता की पैदल व बैलगाड़ी वाली लंबी यात्रा के दिलचस्प किस्से
इतिहासकारों और पुराने दस्तावेजों के मुताबिक, रेल सेवा शुरू होने से पहले रांची से कलकत्ता (अब कोलकाता) या उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक केंद्र दिल्ली की यात्रा करना किसी जंग जीतने जैसा था। लोग समूहों में चलते थे ताकि जंगली जानवरों और लुटेरों से बचा जा सके। रास्ते में घने जंगलों, नदियों और पहाड़ों को पार करने के लिए कोई पुल या सड़क नहीं होती थी, बल्कि लोग नदी के बहाव को देखकर पैदल ही उसे पार करते थे। कई बुजुर्गों के संस्मरणों में यह बात दर्ज है कि रांची से कलकत्ता की दूरी तय करने में बैलगाड़ियों या पैदल यात्रियों को महीनों लग जाते थे। रास्ते में पड़ने वाले पड़ावों पर विश्राम किया जाता था और कुओं के पानी से प्यास बुझाई जाती थी।
#1. आधुनिक परिवहन क्रांति और आज की रफ्तार: अतीत से कितना बदल गया है सफर?
वक्त के साथ तकनीक ने करवट ली और धीरे-धीरे रांची में मोटर वाहन, बसें और अंततः आधुनिक हाइवे तथा हवाई अड्डे का विकास हुआ। आज जहां हम कुछ ही घंटों में रांची से दिल्ली या कोलकाता की दूरियां नाप लेते हैं, वहीं 120 साल पुराना वह संघर्षपूर्ण दौर हमें यह अहसास कराता है कि हमारे पूर्वजों ने कितनी कठिनाइयों का सामना कर इस आधुनिक समाज की नींव रखी थी। रांची का परिवहन इतिहास इस बात का गवाह है कि कैसे मानव सभ्यता ने अपनी सुगमता और विकास के लिए प्रकृति की हर बाधा को पार करते हुए पटरियों से लेकर उड़ानों तक का यह लंबा और अद्भुत सफर तय किया है।