Jharkhand Strike : क्या अब ठप पड़ जाएगा गांवों का विकास? हज़ारों कर्मियों ने काम छोड़ सड़क पर डेरा डाला
News India Live, Digital Desk : अक्सर हम "महिला सशक्तिकरण" और "गांवों के विकास" की बातें बड़े-बड़े मंचों से सुनते हैं। लेकिन जो लोग जमीन पर, धूप और धूल में तपकर इस विकास को सच करते हैं, आज वो ही खुद को बेसहारा महसूस कर रहे हैं।
झारखंड की राजधानी रांची (Ranchi) में और राज्य के अलग-अलग कोनों में इस समय एक ही गूंज सुनाई दे रही है हमारी नौकरी पक्की करो!"
मामला झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) के कर्मियों और सामुदायिक कैडर का है। ये वो लोग हैं जो सरकारी योजनाओं को सुदूर गांवों तक पहुँचाते हैं। सखी मंडल (Sakhi Mandal) से लेकर गरीबी उन्मूलन की योजनाओं तक, इन्ही के कंधों पर जिम्मेदारी है। लेकिन अब इनका सब्र का बांध टूट गया है।
आखिर सड़क पर क्यों आना पड़ा?
हजारों की संख्या में आजीविका कर्मी हड़ताल (Strike) पर चले गए हैं। इनकी नाराजगी सिर्फ एक दिन की नहीं है, बल्कि सालों के 'असुरक्षित भविष्य' का नतीजा है। इनका कहना है कि वे सालों से जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन उनकी हालत नहीं बदली।
इनकी मुख्य मांग बहुत सीधी और जायज है—जॉब सिक्योरिटी (Job Security)।
इन कर्मियों का दर्द यह है कि उन्हें "कांट्रैक्ट" (Contract) के नाम पर कभी भी नौकरी से हटाने का डर बना रहता है। महंगाई के इस दौर में उन्हें न तो सही वेतन मिल रहा है और न ही भविष्य की कोई सुरक्षा। इनका सवाल है—"जब काम पक्का कर रहे हैं, तो नौकरी कच्ची क्यों?"
क्या मांग रहे हैं ये कर्मी?
प्रदर्शनकारी कर्मी अब किसी 'आश्वासन' या मीठी बातों में आने के मूड में नहीं हैं। उनकी मांगें स्पष्ट हैं:
- नियमितीकरण (Regularization): उनकी सेवाओं को स्थायी किया जाए।
- HR पॉलिसी: एक ठोस एचआर पॉलिसी बने, जिससे उन्हें सम्मानजनक वेतन और सुविधाएं मिलें।
- हटाए गए कर्मियों की वापसी: जो साथी बेवजह हटाए गए, उन्हें वापस लिया जाए।
"बात नहीं बनी तो उग्र होगा आंदोलन"
प्रदर्शनकारी नेताओं ने सरकार को दो टूक कह दिया है कि इस बार वो पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने 'घेरा डालो-डेरा डालो' की रणनीति अपना ली है। उनका कहना है कि चुनाव के वक्त वादे तो बड़े-बड़े किए गए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद फाइलों पर धूल जम गई है।
आम जनता पर असर
दोस्तों, इस हड़ताल का सीधा असर झारखंड के ग्रामीण इलाकों पर पड़ने वाला है। गांवों में स्वयं सहायता समूहों (SHG) का काम रुक सकता है। मनरेगा से जुड़ी मदद हो या महिलाओं को स्वावलंबी बनाने की मुहीम, सब पर ब्रेक लग सकता है।
अब देखना यह है कि क्या हेमंत सोरेन सरकार, जो खुद को जल-जंगल-जमीन और गरीबों की सरकार कहती है, इन कर्मियों के आंसुओं को पोंछ पाती है? या फिर यह हड़ताल कोई बड़ा रूप लेगी?
आप इन कर्मियों की मांगों को कितना सही मानते हैं? अपनी राय जरूर रखें।