Jharkhand Sarhul : जमशेदपुर में सरहुल की धूम प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम, मांदर की थाप पर थिरकी लौहनगरी
News India Live, Digital Desk: झारखंड के सबसे बड़े प्राकृतिक पर्व 'सरहुल' (Sarhul) का उत्साह आज लौहनगरी जमशेदपुर और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में चरम पर रहा। चैत्र शुक्ल तृतीया के पावन अवसर पर आदिवासी समाज ने जल, जंगल और जमीन की पूजा कर प्रकृति के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की। सखुआ (साल) के पेड़ों के नीचे स्थित 'जहेर थान' और 'सरना स्थल' पर पाहन (पुजारी) द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान पूरा शहर मांदर की गूंज और पारंपरिक गीतों से सराबोर नजर आया।
प्रकृति और मानव का मिलन: सखुआ फूलों की पूजा
सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है।
सखुआ का महत्व: मान्यता है कि जब सखुआ के पेड़ों पर नए फूल (सरई फूल) खिलते हैं, तब नए साल का आगमन होता है। पाहन ने सखुआ के फूलों को घड़े के शुद्ध जल में डुबोकर सुख-समृद्धि की कामना की।
भविष्यवाणी की परंपरा: पूजा के दौरान घड़े के पानी के स्तर को देखकर आने वाले साल में बारिश और फसल की स्थिति की भविष्यवाणी की गई, जिसे सुनने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटे।
पारंपरिक परिधान और मांदर की थाप
जमशेदपुर के करनडीह, परसुडीह, बागबेड़ा और बिष्टुपुर जैसे इलाकों में भव्य शोभायात्राएं निकाली गईं।
लाल-सफेद पांड़: आदिवासी पुरुष और महिलाएं अपने पारंपरिक लाल-सफेद पांड़ (साड़ी) और धोती में सजे-धजे नजर आए। महिलाओं ने अपने जूडो में सखुआ के फूल खोंसकर प्रकृति की सुंदरता को प्रदर्शित किया।
सामूहिक नृत्य: अखड़ा में युवक-युवतियों ने मांदर, नगाड़ा और ढोल की थाप पर सामूहिक नृत्य किया। यह दृश्य सामुदायिक एकजुटता और उल्लास का प्रतीक बना।
सियासी दिग्गजों की मौजूदगी
पर्व की महत्ता को देखते हुए जमशेदपुर के विभिन्न सरना स्थलों पर राजनीतिक हस्तियों का भी जमावड़ा रहा। स्थानीय विधायकों और जन प्रतिनिधियों ने भी मांदर की थाप पर पैर थिरकाए और लोगों को सरहुल की शुभकामनाएं दीं। प्रशासन ने शोभायात्राओं को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे और कई रूटों पर ट्रैफिक डायवर्जन भी लागू किया गया था।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
सरहुल का संदेश आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो गया है। पूजा के दौरान पाहन ने समाज को पेड़ों की रक्षा करने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का संकल्प दिलाया। लोगों के बीच 'हंडिया' (पारंपरिक पेय) और 'सरई' के फूलों का प्रसाद वितरित किया गया, जो इस उत्सव की मिठास को और बढ़ाता है।