झारखंड हाई कोर्ट का सरकार से सख्त सवाल मसौदा तैयार है, तो PESA एक्ट लागू करने में हिचक क्यों?
News India Live, Digital Desk : झारखंड अलग राज्य बने 20 साल से ज्यादा हो गए, लेकिन जिस "जल, जंगल और जमीन" के अधिकार के लिए यह राज्य बना था, उसकी लड़ाई आज भी अदालतों में लड़ी जा रही है। बात हो रही है पेसा कानून (PESA Act) की, यानी 'पंचयात उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम'।
यह कानून आदिवासियों और ग्राम सभाओं को असली ताकत देता है। लेकिन दुख की बात है कि आज तक झारखंड में इसकी नियमावली (Rules) पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। अब झारखंड हाई कोर्ट (Jharkhand High Court) ने इस लेटलतीफी पर सरकार की क्लास लगा दी है।
चीफ जस्टिस ने क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) ने सरकार से दो टूक पूछा कि जब आपने ड्राफ्ट तैयार कर लिया है, जनता से सुझाव भी मांग लिए हैं, तो अब इसे फाइनल करके लागू करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
कोर्ट ने साफ कहा कि हमें ठोस जवाब चाहिए कि यह कानून कब तक धरातल पर उतरेगा।
क्यों जरुरी है PESA एक्ट?
अगर आप सोच रहे हैं कि यह सिर्फ एक सरकारी कागज है, तो ऐसा नहीं है। PESA एक्ट लागू होने का मतलब है:
- ग्राम सभा सबसे ऊपर: गांव के विकास के फैसले रांची या दिल्ली में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल (ग्राम सभा) में होंगे।
- संसाधनों पर हक: आदिवासी क्षेत्रों में बालू, जमीन और जंगल के इस्तेमाल का फैसला ग्राम सभा करेगी।
- जमीन वापसी: अगर किसी आदिवासी की जमीन धोखे से ली गई है, तो PESA कानून के तहत उसे वापस पाने की शक्ति मिलती है।
यही वजह है कि राज्य का आदिवासी समाज लंबे समय से इसकी मांग कर रहा है।
सरकार क्या कह रही है?
हेमंत सोरेन (Hemant Soren) सरकार का कहना है कि वे इस पर काम कर रहे हैं। महाधिवक्ता (Advocate General) ने कोर्ट को बताया कि PESA नियमावली के ड्राफ्ट पर लगभग 300 सुझाव आए हैं और सरकार उन पर विचार कर रही है ताकि जब कानून लागू हो तो उसमें कोई कमी न रहे। सरकार का कहना है कि यह "अंतिम चरण" में है।
लेकिन कोर्ट और जनता, दोनों अब "जल्द होगा" सुनकर थक चुके हैं।