झारखंड हाई कोर्ट की सरकार को अंतिम चेतावनी, लापरवाही पड़ी भारी तो सचिव को जेब से भरने होंगे ₹10,000

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News India Live, Digital Desk: झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य में पिछले 10 वर्षों में बने पुलों के टूटने (Bridge Collapse) के मामलों पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने ग्रामीण विकास विभाग की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो विभाग के सचिव को अपनी जेब से जुर्माना भरना होगा।

पुल गिरने की घटनाओं पर 'सुपर फिक्स' की तैयारी?

पंकज कुमार यादव द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) में राज्य में पिछले एक दशक के दौरान कई पुलों के ध्वस्त होने की घटनाओं की जांच की मांग की गई है।

कोर्ट की फटकार: अदालत ने कहा कि 27 नवंबर 2025 और 9 जनवरी 2026 को आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार ने अब तक शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल नहीं किया है।

सचिव पर गिरेगी गाज: कोर्ट ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को अंतिम मौका देते हुए कहा कि अगर 24 फरवरी 2026 तक जवाब नहीं मिला, तो उन पर ₹10,000 का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया जाएगा।

सरकारी खजाने से नहीं होगा भुगतान: यह जुर्माना सचिव को अपने वेतन या निजी कोष से याचिकाकर्ता को देना होगा, राज्य सरकार इसका बोझ नहीं उठाएगी।

भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण पर सवाल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य में करोड़ों की लागत से बने पुल उद्घाटन से पहले या कुछ ही समय बाद गिर गए। यह न केवल जनता के पैसे की बर्बादी है बल्कि सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी है।

जवाबदेही तय होगी: कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और निर्माण की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच चाहती है।

डेडलाइन तय: अब राज्य सरकार के पास अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए केवल 24 फरवरी तक का समय है।

अगली सुनवाई: मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 18 मार्च 2026 को तय की गई है।