Jharkhand Education Crisis : बेटी पढ़ाओ पर स्वच्छता का ग्रहण ,झारखंड के 500 सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं

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News India Live, Digital Desk: झारखंड में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की स्थिति बदतर बनी हुई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, राज्य के लगभग 500 सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग से क्रियाशील शौचालय (Functional Toilet) की सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति न केवल 'स्वच्छ भारत अभियान' की विफलता को दर्शाती है, बल्कि छात्राओं की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रही है।

1. आंकड़ों की जुबानी बदहाली (The Numbers)

शिक्षा विभाग के सर्वे और UDISE+ की रिपोर्ट के विश्लेषण से जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:

शौचालय विहीन स्कूल: राज्य के 500 से अधिक प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था कागजों तक सीमित है।

बदहाल स्थिति: कई स्कूलों में शौचालय बने तो हैं, लेकिन पानी की कमी, टूटे दरवाजे या साफ-सफाई के अभाव के कारण वे इस्तेमाल के लायक नहीं हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति: सबसे खराब स्थिति पलामू, चतरा, लातेहार और साहेबगंज जैसे दूरदराज के जिलों में है।

2. छात्राओं पर क्या हो रहा है असर?

बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सीधा असर छात्राओं की उपस्थिति और शिक्षा पर पड़ रहा है:

प्रभावविवरण
बढ़ता ड्रॉपआउट (Dropout)शौचालय न होने के कारण विशेष रूप से किशोर छात्राएं (Adolescent Girls) स्कूल छोड़ रही हैं।
स्वास्थ्य का खतरालंबे समय तक शौचालय का उपयोग न करने या असुरक्षित स्वच्छता के कारण छात्राओं में UTI और अन्य संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है।
गरिमा का हननछात्राओं को खुले में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो उनकी सुरक्षा और निजता के लिए बड़ा खतरा है।

3. बजट का आवंटन और जमीनी हकीकत

सरकार हर साल स्कूलों के रखरखाव और स्वच्छता के लिए भारी-भरकम बजट जारी करती है। इसके बावजूद 500 स्कूलों में सुविधा न होना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है।

फंड का उपयोग: सूत्रों के अनुसार, कई स्कूलों में 'स्कूल विकास अनुदान' (School Development Grant) का सही उपयोग नहीं हो पाया है।

रखरखाव की कमी: शौचालय निर्माण के बाद उनके मेंटेनेंस के लिए कोई स्थाई व्यवस्था नहीं है।

4. शिक्षा विभाग का क्या है पक्ष?

रिपोर्ट सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों (DEOs) को सख्त निर्देश दिए हैं:

सर्वेक्षण: 15 दिनों के भीतर उन सभी स्कूलों की सूची अपडेट की जाए जहाँ शौचालय की मरम्मत या निर्माण की आवश्यकता है।

प्राथमिकता: विभाग का दावा है कि 'समग्र शिक्षा अभियान' के तहत नए वित्तीय वर्ष (2026-27) में इन 500 स्कूलों को प्राथमिकता के आधार पर फंड दिया जाएगा।

सामुदायिक सहयोग: ग्राम शिक्षा समितियों को शौचालयों की सफाई सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

 क्या केवल भवन बनाना काफी है?

सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा खड़ा कर देना स्वच्छता नहीं है। झारखंड के इन स्कूलों में पानी की उपलब्धता और नियमित सफाई सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक स्कूलों में पानी के कनेक्शन और सफाई कर्मचारी की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 'पिंक टॉयलेट' जैसे प्रोजेक्ट केवल कागजी आंकड़े बनकर रह जाएंगे।

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