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April 05 2026 02:06 pm

Jharkhand Crime : नक्सली संगठन का बड़ा चेहरा शांत बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में प्रशांत बोस उर्फ किशन दा की मौत, रेंस भेजा गया शव

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News India Live, Digital Desk: झारखंड की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में बंद प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी (CPI-Maoist) के शीर्ष नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ 'किशन दा' का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। 75 वर्षीय प्रशांत बोस ने सुबह करीब 4:00 बजे जेल परिसर में ही अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही जेल प्रशासन और सुरक्षा महकमे में हलचल तेज हो गई है। जेल अधिकारियों ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए रिम्स (RIMS) अस्पताल भेज दिया है।

कौन थे किशन दा? माओवादी संगठन में था शीर्ष कद

प्रशांत बोस मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे और उन्हें नक्सली गलियारों में 'किशन दा' के नाम से जाना जाता था। वे भाकपा माओवादी के सबसे अनुभवी और रणनीतिकार नेताओं में से एक माने जाते थे। साल 2004 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) और पीपुल्स वार (PW) के विलय में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इस विलय के बाद ही वे नवगठित भाकपा माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य बनाए गए थे। उनकी पत्नी शीला मरांडी भी नक्सली संगठन से जुड़ी रही हैं और वर्तमान में वे भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर रही हैं।

2021 में हुई थी गिरफ्तारी, लंबे समय से थे बीमार

झारखंड पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए प्रशांत बोस एक बड़ी चुनौती थे। उन्हें 21 नवंबर 2021 को सरायकेला के पास से गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद से ही वे रांची की बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद थे। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। जेल प्रशासन द्वारा उन्हें नियमित चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा रही थी, लेकिन शुक्रवार सुबह उनकी स्थिति अचानक बिगड़ गई और उनका निधन हो गया।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, रिम्स में पोस्टमार्टम की तैयारी

नक्सली संगठन के इतने बड़े नेता की मौत के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर है। रिम्स अस्पताल और जेल के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत के सटीक कारणों का पता चल पाएगा, हालांकि प्राथमिक दृष्टि से यह प्राकृतिक मृत्यु मानी जा रही है। प्रशांत बोस की मौत को नक्सली संगठन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे संगठन के उन गिने-चुने जीवित सदस्यों में से थे जिन्होंने नक्सल आंदोलन की शुरुआत से ही नेतृत्व किया था।