BRICS के चक्कर में भारत को दूर करना हमारी बड़ी भूल, जर्मनी ने जयशंकर के सामने कबूल की अपनी गलती
News India Live, Digital Desk: अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच से एक बेहद चौंकाने वाली और भारत के बढ़ते कद को दर्शाने वाली खबर सामने आई है। जर्मनी की विदेश मंत्री एनालेना बेयरबॉक (Annalena Baerbock) ने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान यह स्वीकार किया है कि यूरोप ने अतीत में भारत से दूरी बनाकर एक बड़ी रणनीतिक चूक की थी।
यूरोप का 'बदला हुआ नजरिया': जर्मनी का बड़ा बयान
जर्मन विदेश मंत्री ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) गठबंधन के उभरने के दौरान यूरोप ने भारत को एक अलग गुट का हिस्सा मानकर उससे दूरी बना ली थी। बेयरबॉक के अनुसार:
गलतफहमी का दौर: यूरोप को लगा था कि भारत केवल पश्चिमी विरोधी गुट का हिस्सा बन रहा है।
रणनीतिक भूल: इस दूरी की वजह से यूरोप ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ सहयोग के कई बड़े मौके गंवा दिए।
अब सुधार की बारी: जर्मनी अब भारत को केवल एक 'साझेदार' नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक 'अनिवार्य स्तंभ' (Indispensable Pillar) मानता है।
एस. जयशंकर का 'मास्टरस्ट्रोक' और भारत की धमक
इस बातचीत के दौरान एस. जयशंकर ने भारत के पक्ष को मजबूती से रखा। भारत ने हमेशा यह साफ किया है कि उसकी विदेश नीति किसी एक गुट (पश्चिम या पूर्व) तक सीमित नहीं है। भारत 'मल्टी-एलाइनमेंट' (बहु-पक्षीय गठबंधन) में विश्वास रखता है, जहाँ वह रूस के साथ भी संबंध रखता है और अमेरिका व यूरोप के साथ भी कंधे से कंधा मिलाकर चलता है।
क्यों बदला जर्मनी और यूरोप का रुख?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
चीन पर निर्भरता कम करना: यूरोप अब अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन का विकल्प तलाश रहा है, और भारत सबसे मजबूत दावेदार है।
रूस-यूक्रेन युद्ध: इस संकट के बीच भारत की तटस्थ और शांतिपूर्ण भूमिका ने यूरोप को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर किया।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र: समुद्र में व्यापारिक सुरक्षा के लिए भारत के बिना कोई भी वैश्विक शक्ति अपनी रणनीति सफल नहीं बना सकती।
भारत-जर्मनी साझेदारी का नया अध्याय
जर्मनी का यह बयान न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि यूरोपीय संघ (EU) के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की राह भी आसान कर सकता है। अब जर्मनी रक्षा, तकनीक और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत के साथ 'सुपर-स्पीड' से काम करना चाहता है।