Indian Film Awards : नेशनल अवॉर्ड आखिर मिलता कैसे है? पर्दे के पीछे की पूरी कहानी, जो आपको हैरान कर देगी

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News India Live, Digital Desk:  Indian Film Awards :  हर साल जब नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स का ऐलान होता है, तो सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक एक बहस छिड़ जाती है. "इस एक्टर को क्यों मिला अवॉर्ड?", "मेरी फेवरेट फिल्म को क्यों नहीं चुना गया?", "क्या ये सब फिक्स होता है?". ये सवाल हम सबके मन में आते हैं. हमें लगता है कि जो फिल्म सबसे ज़्यादा कमाई करती है या जिसे सब पसंद करते हैं, अवॉर्ड उसी को मिलना चाहिए.

लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है. नेशनल अवॉर्ड्स की दुनिया बॉक्स ऑफिस की चमक-धमक से तय नहीं होती. यहां कला, सिनेमा की समझ और सामाजिक प्रासंगिकता को परखा जाता है. इसे चुनने की प्रक्रिया इतनी परतदार और सख्त है कि आप जानकर हैरान रह जाएंगे. तो चलिए, आज पर्दे के पीछे चलते हैं और समझते हैं कि देश का सबसे प्रतिष्ठित फिल्म सम्मान आखिर दिया कैसे जाता है.

पहला कदम: फिल्मों का बुलावा

सबसे पहले, भारत सरकार का फिल्म समारोह निदेशालय (Directorate of Film Festivals) एक ऐलान करता है. वो देशभर के फिल्ममेकर्स को अपनी फिल्में भेजने के लिए आमंत्रित करता है. लेकिन इसमें कोई भी फिल्म हिस्सा नहीं ले सकती. इसके लिए एक शर्त होती है कि फिल्म को पिछले साल, यानी 1 जनवरी से 31 दिसंबर के बीच, सेंसर बोर्ड (CBFC) से सर्टिफिकेट मिला हो.

दूसरा कदम: जूरी का गठन (असली खिलाड़ी)

यहीं से असली खेल शुरू होता है. सरकार देश के जाने-माने फिल्मी दिग्गजों की एक टीम बनाती है, जिसे 'जूरी' कहते हैं. इसमें कोई नेता या अफसर नहीं, बल्कि सिनेमा की गहरी समझ रखने वाले लोग होते हैं, जैसे:

  • जाने-माने डायरेक्टर्स
  • अनुभवी एक्टर्स
  • लेखक और पटकथा लेखक
  • वरिष्ठ फिल्म समीक्षक

यह जूरी भी तीन हिस्सों में बंटी होती है:

  1. फीचर फिल्म जूरी: यह सबसे बड़ी जूरी होती है, जो आम फिल्मों (जैसे RRR, रॉकेट्री) को देखती है. इसके भी कई छोटे-छोटे ग्रुप (क्षेत्रीय पैनल) होते हैं, जैसे नॉर्थ, साउथ, ईस्ट, वेस्ट, जो अपने-अपने इलाके की फिल्में देखते हैं.
  2. नॉन-फीचर फिल्म जूरी: यह डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों को परखती है.
  3. सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन जूरी: यह सिनेमा पर लिखी गई किताबों और लेखों का मूल्यांकन करती है.

तीसरा कदम: फिल्मों को देखने का मैराथन

अब आता है सबसे मुश्किल काम. मान लीजिए, देशभर से 300 फिल्में आईं. तो क्या एक ही जूरी ये सारी फिल्में देखती है? नहीं.

  • पहले राउंड की छंटनी: सबसे पहले, फीचर फिल्मों के क्षेत्रीय पैनल (जैसे साउथ पैनल) अपने हिस्से में आई सभी फिल्मों (जैसे तमिल, तेलुगु, मलयालम) को देखते हैं. फिर वे इनमें से बेस्ट फिल्मों की एक लिस्ट बनाकर आगे भेजते हैं.
  • दूसरे राउंड का मुकाबला: अब इन सभी क्षेत्रीय पैनलों से छंटकर आईं बेस्ट फिल्में (मान लीजिए 50-60 फिल्में) सेंट्रल जूरी के पास पहुंचती हैं. यानी सेंट्रल जूरी को 300 नहीं, बल्कि देश की पहले से चुनी हुई बेस्ट फिल्में ही देखनी पड़ती हैं.
  • बहस, वोटिंग और आखिरी फैसला: सेंट्रल जूरी इन सभी चुनी हुई फिल्मों को देखती है. इसके बाद शुरू होता है लंबी चर्चा और बहस का दौर. हर कैटेगरी, जैसे- बेस्ट एक्टर, बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट फिल्म, पर गहन विचार-विमर्श होता है. अगर किसी फैसले पर सहमति नहीं बनती, तो वोटिंग भी की जाती है.

और आखिर में... ऐलान

जब सभी विजेताओं के नाम तय हो जाते हैं, तो जूरी के चेयरमैन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पूरे देश के सामने विजेताओं के नामों का ऐलान करते हैं. इसके कुछ महीनों बाद दिल्ली में एक भव्य समारोह होता है, जहां भारत के राष्ट्रपति अपने हाथों से विजेताओं को यह प्रतिष्ठित सम्मान देते हैं.

तो अगली बार जब नेशनल अवॉर्ड्स का ऐलान हो, तो याद रखिएगा कि यह फैसला कुछ दिनों का नहीं, बल्कि कई महीनों की मेहनत, सैकड़ों फिल्मों की परख और दर्जनों विशेषज्ञों की लंबी बहस का नतीजा है.