पंजाब में फिर धर्म के इर्द-गिर्द घूमने लगी सियासत! पंथक वोट बैंक बिखरने की आशंका से सभी राजनीतिक दलों में मची भारी खलबली
पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक बहुत बड़ा वैचारिक और रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने राज्य के पारंपरिक सियासी समीकरणों को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। सूबे की सियासत एक बार फिर पूरी तरह से धर्म और पंथक मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमटने लगी है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और धार्मिक विमर्श के हावी होने के बाद, शिरोमणि अकाली दल से लेकर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक के नेताओं की धड़कनें बढ़ गई हैं। सभी दलों को डर सता रहा है कि पंजाब का पारंपरिक 'पंथक वोट बैंक' इस बार किसी एक पाले में जाने के बजाय बुरी तरह बिखर सकता है, जिसके चलते सभी दल अब नए सिरे से नफा-नुकसान का आकलन करने में जुट गए हैं।
पारंपरिक पंथक राजनीति के गढ़ में सेंधमारी का बढ़ा खतरा
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (SAD) को हमेशा से सिखों और पंथक हितों का सबसे बड़ा पैरोकार माना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों से इस वोट बैंक में लगातार सेंधमारी हुई है। अब नए और कट्टर धार्मिक मुद्दों के दोबारा उभरने से यह पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह त्रिशंकु की स्थिति में नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब का ग्रामीण और सिख बहुल मतदाता अब पारंपरिक चेहरों के बजाय वैचारिक शुद्धता और धार्मिक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। यही वजह है कि अकाली दल अपने बिखरे हुए कुनबे को समेटने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है, ताकि उनकी मुख्य राजनीतिक जमीन बची रहे।
आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी की रणनीतियों में बड़ा बदलाव
इस धार्मिक ध्रुवीकरण और पंथक वोट बैंक के बिखरने की आशंका ने सिर्फ क्षेत्रीय दलों को ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पार्टियों को भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार जहां विकास और कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ खुद को धार्मिक संवेदनशीलता से जोड़कर देख रही है, वहीं कांग्रेस भी पंजाब के मालवा और माझा जैसे क्षेत्रों में अपने पारंपरिक वोट आधार को बचाने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी पंजाब के शहरी और सिख बुद्धिजीवियों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए लगातार बड़े सिख चेहरों और धार्मिक इतिहास को सम्मान देने जैसी रणनीतियों पर काम कर रही है।
माझा, मालवा और दोआबा के जमीनी समीकरणों को साधने की होड़
भौगोलिक और क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखें तो पंजाब के तीन मुख्य क्षेत्रों—माझा, मालवा और दोआबा—में धार्मिक और पंथक मुद्दों का असर अलग-अलग तरीके से देखा जाता है। माझा को जहां पंथक राजनीति का मुख्य केंद्र माना जाता है, वहीं मालवा राजनीतिक सत्ता की चाबी रखता है। इन क्षेत्रों के स्थानीय डेरों और धार्मिक संस्थाओं का झुकाव किस तरफ होगा, इसे लेकर अंदरूनी सर्वे और खुफिया आकलन किए जा रहे हैं। कोई भी दल इस समय ऐसा कोई बयान या कदम नहीं उठाना चाहता जिससे बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाएं आहत हों। आने वाले स्थानीय और राज्य स्तर के चुनावों में यह धार्मिक ध्रुवीकरण पंजाब के भविष्य की एक बिल्कुल नई सियासी तस्वीर पेश कर सकता है