झारखंड में हाथियों का काल ,सिर्फ 9 दिनों में 21 जानें गईं, आखिर कब थमेगा मौत का यह सिलसिला?

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News India Live, Digital Desk: झारखंड के जंगलों और गांवों से एक ऐसी खबर आ रही है जो किसी को भी डराने के लिए काफी है। हाथी को हम गजराज कहते हैं और उनकी पूजा करते हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम इलाके में जो हो रहा है, वह एक भयानक दुस्वप्न जैसा है।

हाल ही में खबर आई है कि एक हाथी ने दो और लोगों को अपना शिकार बना लिया। दुख की बात यह है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले 9 दिनों के भीतर हाथियों के हमले में कुल 21 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। ज़रा सोचिए, उस परिवार पर क्या गुजर रही होगी जिसने अचानक अपने अपनों को खो दिया।

शाम होते ही बंद हो जाते हैं दरवाज़े

पश्चिमी सिंहभूम के ग्रामीण इलाकों में आजकल मंज़र ऐसा है कि सूरज ढलते ही लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं। जो गांव कभी शाम की रौनक और बातचीत के लिए जाने जाते थे, वहां आज सिर्फ सन्नाटा और खौफ है। लोग मशालें जलाकर और टोलियां बनाकर रात भर पहरा देने को मजबूर हैं। 21 लोगों की मौत के आंकड़े ने वन विभाग और प्रशासन की नींद भी उड़ा दी है।

क्यों आक्रामक हो रहे हैं हाथी?

यह सवाल हर किसी के मन में है कि अचानक हाथी इतने हिंसक क्यों हो गए? पर्यावरण एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:

  1. कॉरिडोर में दखल: हाथियों के आने-जाने के रास्तों (Elephants Corridor) पर जब इंसानी गतिविधियां या कब्जा बढ़ता है, तो वे भटककर गांवों का रुख करते हैं।
  2. भोजन की कमी: जंगलों के घटने और वहां खाने-पीने की कमी की वजह से हाथी फसलों और घरों की ओर खींचे चले आते हैं।
  3. डर और बचाव: कई बार इंसान और जानवरों का आमना-सामना होने पर डर की वजह से हाथी हमला कर देते हैं।

प्रशासन और वन विभाग के लिए चुनौती

21 मौतों के बाद प्रशासन पर भारी दबाव है। वन विभाग की टीमें हाथियों को खदेड़ने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सफलता मिलना मुश्किल लग रहा है। कई जगहों पर हाथी हाथ नहीं आ रहे हैं और बार-बार अपनी लोकेशन बदल रहे हैं। प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू तो हुई है, लेकिन क्या पैसा उस कमी को पूरा कर सकता है जो मौत ने छोड़ी है?

अब आगे क्या?

जरूरत इस बात की है कि तकनीक और बेहतर मैनेजमेंट का सहारा लिया जाए। हाथियों की हर मूवमेंट पर रेडियो कॉलर या जीपीएस से नजर रखी जानी चाहिए। साथ ही, ग्रामीणों को भी जागरूक किया जाना चाहिए कि अगर हाथी गांव के पास आए, तो वे उनके सामने न जाएं या उन्हें उकसाने की कोशिश न करें।

झारखंड की ये घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता कहीं न कहीं संतुलन खो चुका है। हम उम्मीद करते हैं कि प्रशासन जल्द ही इन हाथियों को सुरक्षित रास्ते पर मोड़ सकेगा और बेकसूर लोगों की जानें जाना रुकेंगी।

इन मुश्किल घड़ी में हमारी संवेदनाएं उन सभी परिवारों के साथ हैं जिन्होंने इस हफ्ते अपने प्रियजनों को खोया है।