KCC का कर्ज़ नहीं चुका पाए तो क्या बैंक ज़मीन नीलाम कर देगा? जानिए पूरा सच और अपने अधिकार

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किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना देश के करोड़ों किसानों के लिए एक बहुत बड़ा सहारा है। बीज, खाद, सिंचाई या खेती से जुड़े दूसरे खर्चों के लिए इससे कम ब्याज पर पैसा मिल जाता है, जिससे साहूकारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर किसी मजबूरी की वजह से कोई किसान यह कर्ज समय पर नहीं चुका पाया, तो क्या होगा? क्या बैंक सच में उसकी मेहनत की कमाई, उसकी ज़मीन को नीलाम कर सकता है?

इसका सीधा जवाब है - हाँ, बैंक ऐसा कर सकता है। लेकिन घबराइए नहीं, यह पहला कदम नहीं, बल्कि आखिरी रास्ता होता है। बैंक के लिए भी नीलामी एक लंबी और झंझट वाली प्रक्रिया है। इसलिए, हर किसान को यह पता होना चाहिए कि इस नौबत तक पहुँचने से पहले क्या-क्या होता है और आपके कानूनी अधिकार क्या हैं।

पहले समझिए, किसान क्रेडिट कार्ड क्या है?

यह योजना 1998 में इसलिए शुरू की गई थी ताकि किसान साहूकारों के भारी-भरकम ब्याज के जाल से बच सकें और सीधे बैंकों से जुड़कर कम ब्याज पर लोन ले सकें। इस कार्ड से किसान को ₹50,000 से लेकर ₹3 लाख तक का लोन आसानी से मिल जाता है। अगर कोई किसान समय पर अपना कर्ज चुकाता है, तो उसे ब्याज पर 2% से 3% की भारी छूट भी मिलती है (यानी 7% का ब्याज 4% ही रह जाता है)।

जब कोई किसान लोन नहीं चुका पाता...

अगर आप समय पर किस्त नहीं भर पाते हैं, तो बैंक तुरंत नीलामी की बात नहीं करता। प्रक्रिया कुछ इस तरह आगे बढ़ती है:

  1. याद दिलाना: बैंक आपको कई बार फोन करके, नोटिस भेजकर याद दिलाता है।
  2. NPA घोषित करना: अगर लगातार 90 दिनों (करीब 3 महीने) तक कोई किस्त नहीं भरी जाती, तो बैंक आपके खाते को 'खराब लोन' (जिसे NPA कहते हैं) मान लेता है।
  3. वसूली की कार्यवाही: इसके बाद बैंक वसूली की प्रक्रिया शुरू करता है। इसमें बातचीत करना, कानूनी नोटिस भेजना और आखिर में ज़मीन को कब्जे में लेने की बात आती है।

ज़मीन की नीलामी कब और कैसे होती है?

अगर नोटिस और बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकलता, तो मामला तहसीलदार या जिला प्रशासन के पास पहुँच जाता है। प्रशासन इस कर्ज को "सरकारी बकाया" मानकर वसूलने की कोशिश करता है। अगर फिर भी बात नहीं बनती, तब जाकर ज़मीन की नीलामी का रास्ता अपनाया जाता है।

इसके लिए सरफेसी एक्ट, 2002 (SARFAESI Act) नाम का एक बहुत सख्त कानून है, जिसके तहत बैंक को गिरवी रखी ज़मीन बेचने के लिए कोर्ट से पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ती।

नीलामी की प्रक्रिया:

  • बैंक अखबार में नीलामी की तारीख और जानकारी छपवाता है।
  • किसान को कर्ज चुकाने का एक आखिरी मौका दिया जाता है।
  • पैसा न मिलने पर, तय तारीख पर ज़मीन की नीलामी कर दी जाती है।
  • नीलामी से मिले पैसे से बैंक अपना कर्ज वसूलता है और अगर कोई पैसा बचता है, तो वह किसान को वापस कर दिया जाता है।

सबसे जरूरी बात: आप नीलामी से कैसे बच सकते हैं?

हिम्मत मत हारिए, आपके पास भी कई रास्ते हैं। सबसे बड़ी गलती जो किसान करते हैं, वो है चुप रह जाना और बैंक से बात न करना।

बातचीत करें: अगर आपको लगता है कि आप किस्त नहीं दे पाएंगे, तो खुद बैंक जाकर मैनेजर से बात करें। उन्हें अपनी परेशानी बताएं। बैंक आपकी किस्तों को आगे बढ़ा सकता है (इसे लोन पुनर्गठन कहते हैं) या एकमुश्त निपटान (One-Time Settlement) का मौका भी दे सकता है, जिसमें आपको मूल राशि में कुछ छूट मिल सकती है।

इन स्थितियों में आपकी ज़मीन नीलाम नहीं हो सकती:

कुछ खास हालात में बैंक आपकी ज़मीन नीलाम नहीं कर सकता, भले ही आपने लोन न चुकाया हो:

  • अगर आपकी फसल बाढ़, सूखे या किसी और प्राकृतिक आपदा में बर्बाद हो गई हो।
  • अगर सरकार ने कर्ज माफी या किसी राहत पैकेज की घोषणा कर दी हो।
  • अगर आप एक छोटे या सीमांत किसान हैं और आपके पास 5 एकड़ से कम ज़मीन है।
  • अगर आपका लोन फसल बीमा योजना में कवर था और बीमा का पैसा अभी तक नहीं मिला है।

आपका आखिरी हथियार: कानून

अगर आपको लगता है कि बैंक नियमों का पालन नहीं कर रहा है, तो आप ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) या कोर्ट में अपील कर सकते हैं। कोर्ट से स्टे ऑर्डर (Stay Order) लेकर नीलामी को अस्थायी रूप से रोका भी जा सकता है।

सबसे बड़ी सीख
 

याद रखिए, ज़मीन की नीलामी बैंक का आखिरी हथियार है, पहला नहीं। अगर आप कर्ज चुकाने में असमर्थ हैं तो डरकर चुप न बैठें। बैंक से संवाद बनाए रखें। समय पर की गई बातचीत और सही जानकारी ही आपकी ज़मीन को बचाने में आपकी सबसे बड़ी मदद कर सकती है।

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