बिहार में प्रशांत किशोर कितना बदलेंगे खेल? ओपिनियन पोल में जन सुराज को मिल रहीं इतनी सीटें
News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति में एक नए खिलाड़ी के तौर पर उभरे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) और उनकी पार्टी 'जन सुराज' आगामी विधानसभा चुनाव में कितना असर डालेगी? यह सवाल हर किसी के मन में है। चुनाव से पहले हुए एक ताजा ओपिनियन पोल ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि प्रशांत किशोर की पार्टी भले ही सरकार बनाने की दौड़ में न हो, लेकिन वह कई सीटों पर NDA और महागठबंधन का खेल बिगाड़ने की ताकत रखती है।
'जन सुराज' को कितनी सीटें?
एक निजी समाचार चैनल द्वारा किए गए इस ओपिनियन पोल के अनुसार, प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' पार्टी को बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 2 से 5 सीटें मिल सकती हैं। हालांकि यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन एक नई पार्टी के लिए इसे एक अच्छी शुरुआत माना जा रहा है।
क्या हैं इस सर्वे के मायने?
- किंगमेकर की भूमिका: भले ही 'जन सुराज' को सिर्फ 2-5 सीटें मिलती दिख रही हैं, लेकिन अगर किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो ऐसी स्थिति में प्रशांत किशोर 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकते हैं।
- किसको पहुंचाएंगे नुकसान?: सबसे बड़ा सवाल यह है कि पीके की पार्टी किसके वोट काटेगी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'जन सुराज' शहरी और शिक्षित मतदाताओं के साथ-साथ उन लोगों के वोट भी खींच सकती है जो पारंपरिक RJD-JDU-BJP की राजनीति से तंग आ चुके हैं। इसका सीधा नुकसान महागठबंधन और NDA दोनों को हो सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है।
- साख का सवाल: प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति को बदलने का दावा किया है। ऐसे में, अगर उनकी पार्टी कुछ सीटें जीतने में कामयाब रहती है, तो यह उनके दावों को मजबूती देगा और बिहार में एक तीसरे विकल्प की राजनीति की नींव रखेगा।
ओपिनियन पोल में कौन आगे?
इस सर्वे में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन को 135 से 145 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाया गया है, जबकि तेजस्वी यादव के महागठबंधन को 85 से 95 सीटों पर ही सिमटते हुए अनुमानित किया गया है।
प्रशांत किशोर का लंबा संघर्ष
प्रशांत किशोर पिछले काफी समय से बिहार में 'जन सुराज पदयात्रा' के जरिए गांव-गांव घूमकर लोगों से जुड़ रहे हैं। वह लगातार बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव, दोनों को घेरते रहे हैं। उनका फोकस एक साफ-सुथरी और विकास की राजनीति पर है।
यह ओपिनियन पोल दिखाता है कि प्रशांत किशोर की मेहनत जमीन पर असर तो डाल रही है, लेकिन इसे सीटों में बदलने के लिए उन्हें अभी और लंबा सफर तय करना होगा। हालांकि, बिहार की राजनीति में उनकी मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है।