बांग्लादेश में खौफनाक मंजर, जान बचाने की कोशिश बनी जानलेवा, मोब जस्टिस की भेंट चढ़ गई एक और जिंदगी

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News India Live, Digital Desk: आजकल पड़ोसी देश बांग्लादेश से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, वे किसी को भी अंदर से झकझोर सकती हैं। कानून अपने हाथ में लेना जब एक आम बात बन जाती है, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत मासूम लोगों या फिर उन लोगों को चुकानी पड़ती है जिन पर भीड़ का बस एक बार 'शक' चला जाता है। हाल ही में एक ऐसी ही घटना सामने आई है जहाँ एक हिंदू युवक को चोरी के संदेह में भीड़ ने खदेड़ा और अंत में उसकी मौत हो गई।

आखिर हुआ क्या था?
पूरी घटना कुछ यूं है कि बांग्लादेश के एक इलाके में एक हिंदू व्यक्ति पर चोरी का आरोप लगा। स्थानीय रिपोर्टों की मानें तो अभी तक कुछ भी साबित नहीं हुआ था, सिर्फ संदेह के आधार पर ही लोग उसके पीछे पड़ गए। भीड़ का गुस्सा इतना ज्यादा था कि वह शख्स अपनी जान बचाने के लिए बदहवास होकर भागने लगा।

भागते-भागते वह पास की एक नहर तक पहुँच गया। पीछे से आते शोर और भीड़ के गुस्से को देखकर उसे कोई रास्ता नहीं सूझा और उसने पानी में छलांग लगा दी। उसे लगा होगा कि शायद पानी में कूदकर वह बच जाएगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वह युवक फिर पानी से बाहर नहीं आ पाया और उसकी डूबने से मौत हो गई।

भीड़ और खौफ का साया
इस घटना ने एक बार फिर उन गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है कि क्या बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए स्थितियाँ सामान्य हैं? जब भी कोई अपराधी या संदिग्ध पकड़ा जाता है, तो उसे पुलिस के हवाले करने के बजाय लोग खुद फैसला क्यों करने लगते हैं? डर के उस पल में जब इंसान को अपनी मौत सामने दिख रही हो, वो कोई भी कदम उठा लेता है, जैसा कि इस मामले में हुआ।

इंसाफ का इंतज़ार
जब यह खबर फैली, तो वहां के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों के बीच गहरी चिंता और दुख का माहौल बन गया। क्या वह सच में चोर था? और अगर था भी, तो क्या उसकी सजा 'मौत' होनी चाहिए थी? यह सवाल अब बांग्लादेश के प्रशासन और वहां के समाज के सामने खड़ा है।

अक्सर ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है, लेकिन जब बात किसी की जिंदगी और सामाजिक भरोसे की हो, तो चुप बैठना भी मुश्किल हो जाता है।

हमारी सोच
हम एक सभ्य समाज में रहते हैं जहाँ किसी को भी अपराधी तय करने का हक सिर्फ कानून को है। किसी के भागने से उसे अपराधी मान लेना या उसे मरने पर मजबूर कर देना किसी भी लिहाज़ से सही नहीं कहा जा सकता।

आप इस तरह की घटनाओं पर क्या सोचते हैं? क्या मोब जस्टिस (भीड़ का फैसला) किसी भी समस्या का समाधान हो सकता है? हमें अपनी राय जरूर बताएं।