HECI : क्या बदलने वाला है आपकी यूनिवर्सिटी में? लाइट बट टाइट रेगुलेशन का असली मतलब समझिए

Post

News India Live, Digital Desk : अगर आप कॉलेज में पढ़ते हैं या शिक्षा जगत से जुड़े हैं, तो आपने अक्सर UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) और AICTE का नाम सुना होगा। कभी-कभी तो यह भी समझ नहीं आता कि कौन सा कॉलेज किसके अंडर आता है और किसके नियम किस पर लागू होते हैं। यह कन्फ्यूजन सिर्फ छात्रों को नहीं, बल्कि खुद संस्थानों को भी होता है।

लेकिन अब एक बड़ी खबर है। सरकार इन अलग-अलग संस्थाओं की जगह एक 'सिंगल विंडो' सिस्टम लाने की तैयारी में है, जिसका नाम है HECI (Higher Education Commission of India)। हाल ही में एक खास बातचीत में पूर्व UGC चीफ ने समझाया है कि यह बदलाव क्यों ज़रूरी है और इसका मतलब क्या है।

आइए, बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं कि भारत की उच्च शिक्षा में क्या नया पक रहा है।

UGC की जगह क्यों ले रहा है HECI?

सालों से हमारे देश में हायर एजुकेशन को संभालने के लिए कई अलग-अलग बॉडीज काम कर रही हैं। टेक्निकल के लिए अलग, नॉन-टेक्निकल के लिए अलग। इससे नियमों की "खिचड़ी" बन जाती है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का सपना है कि सब कुछ एक ही छत के नीचे आ जाए।

HECI के आने का सबसे बड़ा मकसद है—व्यवस्था को सरल बनाना। यानी अब कॉलेज खोलने या नया कोर्स शुरू करने के लिए 10 जगह फाइलें नहीं घुमानी पड़ेंगी।

क्या है "Light but Tight" (हल्का मगर सख्त) फॉर्मूला?

पूर्व UGC चेयरमैन ने इंटरव्यू में एक बहुत दिलचस्प शब्द का इस्तेमाल किया— "Light but Tight Regulation"। इसका क्या मतलब है?

  • Light (हल्का): इसका मतलब है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी को रोजमर्रा के काम में "टोका-टाकी" नहीं झेलनी पड़ेगी। उन्हें यह आज़ादी होगी कि वे क्या पढ़ाना चाहते हैं, कैसे पढ़ाना चाहते हैं और कौन सी रिसर्च करना चाहते हैं। इसे अकादमिक स्वायत्तता (Academic Space) कहते हैं। यानी हुनर दिखाने के लिए खुला आसमान मिलेगा।
  • Tight (सख्त): इसका मतलब है 'क्वालिटी' से कोई समझौता नहीं। नियमों में ढील का मतलब यह नहीं होगा कि कोई भी फर्जीवाड़ा करे। HECI का डंडा उन लोगों पर टाइट रहेगा जो स्टैंडर्ड मेंटेन नहीं करेंगे या गड़बड़ी करेंगे। जवाबदेही (Accountability) पहले से ज्यादा होगी।

पढ़ाई का माहौल कैसे सुधरेगा?

अभी तक कई बार सिलेबस पुराना होता है या टीचर्स को रिसर्च करने के लिए फंड्स के चक्कर में फाइलें अटकती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि HECI आने के बाद:

  1. तेजी से फैसले होंगे: यूनिवर्सिटी अपनी ज़रूरत के हिसाब से फैसले ले पाएगी।
  2. रिसर्च पर जोर: प्रोफेसर और छात्रों को नए आइडियाज पर काम करने के लिए ज्यादा 'स्पेस' मिलेगा, न कि वे बाबूगिरी में उलझे रहेंगे।
  3. ग्लोबल स्टैंडर्ड: हमारे कॉलेजों का स्तर सुधरेगा ताकि विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ हम मुकाबला कर सकें।

चुनौती अभी बाकी है

कागज पर प्लान बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना ही असली चुनौती है। पूर्व चीफ का मानना है कि किसी भी आयोग की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे चलाने वाले लोग कितने विजनरी हैं। कानून बदल देने से शिक्षा नहीं बदलती, उसे लागू करने की नीयत साफ होनी चाहिए।

संक्षेप में कहें तो, HECI का आना भारतीय छात्रों के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है, बशर्ते यह "रेगुलेटर" कम और "फैसिलिटेटर" (मददगार) ज्यादा बने।