घर में सिगरेट पीने वालों की इस आदत से बिना कश लिए जा रही लोगों की जान, भारत में पैसिव स्मोकिंग से मौतों में 50% का खतरनाक उछाल
आधुनिक जीवनशैली, बढ़ते प्रदूषण और खानपान की अनियंत्रित आदतों के बीच स्वास्थ्य से जुड़े कई ऐसे खामोश खतरे हमारे इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं, जिन्हें हम अक्सर मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसा ही एक जानलेवा और अदृश्य खतरा इन दिनों हमारे घरों के भीतर पैर पसार रहा है, जो न केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को बल्कि उसके आसपास रहने वाले बेकसूर लोगों को भी मौत के मुंह में धकेल रहा है। चिकित्सीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े हालिया आंकड़े बेहद डरावने हैं। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट पब्लिक हेल्थ' में प्रकाशित एक नई और व्यापक रिसर्च के अनुसार, भारत में पिछले तीन दशकों यानी 1990 के बाद से सेकंड-हैंड स्मोक यानी 'पैसिव स्मोकिंग' (Passive Smoking) की वजह से होने वाली मौतों के आंकड़ों में लगभग 50 फीसदी का खतरनाक और चौंकाने वाला उछाल दर्ज किया गया है। यदि आपके घर में भी कोई सिगरेट, बीड़ी या तंबाकू का सेवन करता है और आप खुद इन नशों से दूर हैं, तो यह खबर आपके लिए एक बड़ी चेतावनी है क्योंकि बिना एक भी कश लिए हवा में फैल रहा यह जहरीला धुआं आपके लिए एक साइलेंट किलर साबित हो रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि पैसिव स्मोकिंग का यह खामोश खतरा हमारे देश और समाज को किस प्रकार खोखला कर रहा है।
'द लैंसेट पब्लिक हेल्थ' की रिपोर्ट: भारत में हर साल तीन लाख से ज्यादा बेकसूर गंवा रहे हैं जान
पैसिव स्मोकिंग के बढ़ते खतरे को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी को भी गहरी चिंता में डालने के लिए काफी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1990 में देश में पैसिव स्मोकिंग की वजह से कुल 2,17,700 मौतें दर्ज की गई थीं, जो कि समय के साथ लगातार बढ़ती गईं और साल 2023 तक आते-आते यह भयानक आंकड़ा बढ़कर 3,25,600 तक पहुंच गया। इसका सीधा मतलब यह है कि सिर्फ एक साल के भीतर भारत में तीन लाख से अधिक लोगों ने अपनी मर्जी के खिलाफ, बिना सिगरेट पिए, केवल दूसरों के छोड़े गए धुएं के संपर्क में आने के कारण अपनी अमूल्य जान गंवा दी। चीन के बाद पूरी दुनिया में पैसिव स्मोकिंग का सबसे बड़ा दंश यदि कोई देश झेल रहा है, तो वह भारत है। वर्तमान समय में देश की कुल आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी करीब 44.4 करोड़ लोग इस जहरीले और घातक धुएं की सीधी चपेट में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
प्रभावित लोगों की संख्या में क्यों हुई बढ़ोतरी, क्या कहते हैं तीन दशकों के आंकड़े
यह समझना बेहद दिलचस्प और जरूरी है कि पिछले कुछ वर्षों में धुएं के संपर्क में आने की कुल दर में भले ही कुछ कमी आई हो, लेकिन इसके बावजूद इससे प्रभावित होने वाले और अपनी जान गंवाने वाले मरीजों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन दशकों में पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में आने की दर 43.2% से घटकर 30.6% पर जरूर आई है, लेकिन देश की आबादी में बेतहाशा तेजी से हुई वृद्धि के कारण प्रभावित होने वाले लोगों की कुल संख्या में 18.4% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 1990 के दौरान जहां देश में 37.5 करोड़ लोग इस जहरीले धुएं से प्रभावित थे, वहीं वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर सीधे 44.4 करोड़ तक जा पहुंची। इस खतरनाक स्थिति ने देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, जहां लोग अनजाने में ही हर दिन मौत के साए में जीने को मजबूर हो रहे हैं।
महिलाएं और पुरुष दोनों बन रहे हैं इस खामोश जहर का शिकार
इस गंभीर स्वास्थ्य संकट ने समाज के किसी भी वर्ग को नहीं बख्शा है, और महिलाएं तथा पुरुष दोनों ही इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 1990 से 2023 के बीच महिलाओं में पैसिव स्मोकिंग के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा 1,13,400 से बढ़कर 1,56,900 तक पहुंच गया है। वहीं दूसरी ओर, पुरुषों के मामले में भी स्थिति कम भयावह नहीं है, जहां यह आंकड़ा 1,04,300 से छलांग लगाकर सीधे 1,68,700 पर जा पहुंचा है। इस खामोश और अदृश्य खतरे के कारण अकेले वर्ष 2023 के दौरान भारत ने अपने लगभग 92.8 लाख स्वस्थ जीवन के वर्ष हमेशा-हमेशा के लिए गंवा दिए हैं। जब घर के भीतर कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है, तो उसके द्वारा छोड़ा गया धुआं कमरे की हवा में घुलकर पूरे परिवार के फेफड़ों तक पहुंचता है, जिससे घर की चारदीवारी सुरक्षित होने का भ्रम टूटने लगता है और घर के सदस्य गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
फेफड़ों के विशेषज्ञ डॉ. ध्रुव आनंद की चेतावनी: शरीर के हर अंग को खोखला कर रहा है यह जहर
नोएडा स्थित फोर्टिस अस्पताल के जाने-माने रेस्पिरेटरी और स्लीप मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. ध्रुव आनंद के अनुसार, पैसिव स्मोकिंग को महज 'थोड़े से धुएं के संपर्क में आना' समझ लेना सबसे बड़ी और घातक भूल है। यह केवल आंखों में जलन पैदा करने वाला धुआं नहीं है, बल्कि यह आपके दिल, फेफड़ों और शरीर की रक्त नलियों (Blood Vessels) पर बहुत गहरा, स्थायी और बुरा असर डालता है। वैज्ञानिक अध्ययन इस बात को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि सेकंड-हैंड स्मोक के संपर्क में रहने के कारण इंसान को स्ट्रोक, फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), इस्केमिक हार्ट डिजीज, ब्रेस्ट कैंसर, टाइप-2 डायबिटीज और गंभीर अस्थमा जैसी लाइलाज व जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना तक बढ़ जाता है। जब कोई दूसरा व्यक्ति सिगरेट पीता है, तो निकलने वाला साइड-स्ट्रीम स्मोक अधिक जहरीला होता है, जो आसपास खड़े या बैठे इंसान के शरीर के अंदर जाकर उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को दीमक की तरह चाट जाता है।
बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग हैं इस जहरीले धुएं के सबसे आसान और संवेदनशील शिकार
डॉ. ध्रुव आनंद का यह स्पष्ट मानना है कि जब घर के बंद कमरों में कोई धूम्रपान करता है, तो वहां मौजूद मासूम बच्चे, घर के बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी दिल या सांस की बीमारी से पीड़ित मरीज इस जहरीले धुएं के सबसे आसान और संवेदनशील शिकार बनते हैं। चूंकि छोटे बच्चों के फेफड़ों और श्वसन तंत्र का विकास अभी पूरी तरह से नहीं हुआ होता है, इसलिए इस धुएं की वजह से उन्हें लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (श्वसन नली का संक्रमण) और निमोनिया जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इसके अलावा बुजुर्गों की कमजोर होती शारीरिक क्षमता इस आघात को सहन नहीं कर पाती, जिससे उनकी सांसें उखड़ने लगती हैं और वे समय से पहले ही मौत के मुंह में चले जाते हैं।
वैश्विक स्तर पर भी हालात बेहद चिंताजनक, तीन बड़े देशों में सिमटी है आधी आबादी
केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पैसिव स्मोकिंग की यह समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। साल 2023 के वैश्विक आंकड़ों पर गौर करें तो दुनिया भर में लगभग 2.71 अरब लोग सेकंड-हैंड स्मोक की प्रत्यक्ष चपेट में आए थे। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में कुल 16.6 लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और लगभग 4.48 करोड़ स्वस्थ वर्षों का भारी नुकसान हुआ। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया भर की कुल प्रभावित आबादी का लगभग आधा हिस्सा केवल तीन बड़े देशों यानी चीन, भारत और इंडोनेशिया तक ही सीमित है। एशिया के इन घनी आबादी वाले देशों में यदि समय रहते तंबाकू नियंत्रण के कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में यह संकट और अधिक भयावह रूप ले सकता है।
बचाव ही है एकमात्र उपाय: अपने घरों और बंद जगहों को बनाएं 100% स्मोक-फ्री
इस जानलेवा और खामोश खतरे से बचने का एकमात्र और सबसे असरदार उपाय यही है कि जागरूकता फैलाई जाए और कड़े कदम उठाए जाएं। विशेषज्ञ डॉ. ध्रुव आनंद की सलाह है कि हर इंसान को अपने घर, अपनी कार और किसी भी प्रकार की बंद इनडोर जगह को 100% 'स्मोक-फ्री' यानी पूरी तरह से धूम्रपान मुक्त बनाना चाहिए। यदि किसी को सिगरेट या तंबाकू का सेवन करना ही है, तो उसे हमेशा घर से बाहर खुली हवा में जाकर ऐसा करना चाहिए ताकि परिवार के अन्य सदस्य इस जहरीले धुएं के संपर्क में न आएं। इसके अलावा, जो लोग खुद धूम्रपान की लत के शिकार हैं, उन्हें अपने प्यारे बच्चों, जीवनसंगिनी और परिवार के अन्य सदस्यों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए आज ही इस घातक लत को छोड़ने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। आपकी एक छोटी सी सावधानी और बदलाव आपके पूरे परिवार को एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन का उपहार दे सकती है।