इंसान से इंसान में फैलने वाली बीमारी का नाम 'स्वाइन' फ्लू क्यों? जानिए नामकरण का असली विज्ञान और बढ़ते खतरे

इंसान से इंसान में फैलने वाली बीमारी का नाम 'स्वाइन' फ्लू क्यों? जानिए नामकरण का असली विज्ञान और बढ़ते खतरे

बदलते मौसम और मानसून के उतार-चढ़ाव के बीच देश के विभिन्न राज्यों में इन्फ्लूएंजा संक्रमण के मामले अचानक तेजी से बढ़ने लगे हैं। अस्पतालों की ओपीडी में तेज बुखार, बदन दर्द और सांस लेने में तकलीफ के साथ पहुंचने वाले मरीजों में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 वायरस की पुष्टि हो रही है। जैसे ही स्वाइन फ्लू का नाम सामने आता है, आम लोगों के मन में कई तरह के सवाल और भ्रांतियां पैदा होने लगती हैं। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब यह बीमारी हवा के जरिए एक संक्रमित इंसान से दूसरे इंसान में इतनी तेजी से फैलती है, तो फिर इसके नाम में 'स्वाइन' यानी सूअर का शब्द क्यों जुड़ा हुआ है? क्या इसका सूअर के मांस खाने या उनके संपर्क में आने से आज भी कोई सीधा संबंध है? सार्वजनिक स्वास्थ्य के जानकारों और वायरोलॉजिस्ट्स के मुताबिक, इसके नामकरण के पीछे एक सदी पुराना जैविक और वैज्ञानिक इतिहास छिपा है।

स्वाइन फ्लू के नाम में 'सूअर' क्यों जुड़ा है? समझिए उत्पत्ति का पूरा विज्ञान

चिकित्सा विज्ञान में इन्फ्लूएंजा वायरस को अलग-अलग प्रकारों में बांटा गया है। स्वाइन इन्फ्लूएंजा मूल रूप से सूअरों में श्वसन तंत्र को प्रभावित करने वाला एक वायरल संक्रमण था। 1930 के दशक में पहली बार वैज्ञानिकों ने सूअरों में इस वायरस की पहचान की थी। उस समय यह वायरस केवल जानवरों तक ही सीमित रहता था। लेकिन वायरस अपनी प्रकृति के अनुसार लगातार म्यूटेट यानी अपना रूप बदलते रहते हैं। सूअर के श्वसन तंत्र की संरचना ऐसी होती है कि वह इंसानी वायरस, पक्षियों के एवियन वायरस और सूअर के अपने इन्फ्लूएंजा वायरस तीनों के लिए एक 'मिक्सिंग बाउल' (जीववैज्ञानिक प्रयोगशाला) की तरह काम करता है।

साल 2009 में जब इस वायरस का एक नया स्ट्रेन सामने आया, तो वैज्ञानिकों ने पाया कि इस नए वायरस के जेनेटिक मटीरियल (आरएनए) में सुअरों में पाए जाने वाले इन्फ्लूएंजा वायरस के गुण बहुत अधिक मात्रा में मौजूद थे। चूंकि इसका मुख्य जेनेटिक ढांचा सूअरों के वायरस से काफी मिलता-जुलता था, इसलिए प्रयोगशालाओं और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे शुरुआती दौर में 'स्वाइन-ओरिजिन इन्फ्लूएंजा वायरस' कहा, जो बाद में बोलचाल में केवल 'स्वाइन फ्लू' बनकर रह गया। हालांकि वैज्ञानिक रूप से इसे इन्फ्लूएंजा ए (H1N1) pdm09 कहा जाता है।

क्या आज भी सूअर के संपर्क में आने से फैलता है यह वायरस?

यह समाज में फैली सबसे बड़ी भ्रांतियों में से एक है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने पूरी तरह स्पष्ट किया है कि वर्तमान में फैल रहा H1N1 वायरस पूरी तरह से ह्यूमन-टू-ह्यूमन यानी इंसान से इंसान में फैलने वाला वायरस बन चुका है। इसका वर्तमान प्रसार किसी सूअर को छूने या उसके पास जाने से नहीं हो रहा है। इसके अलावा, अच्छी तरह पका हुआ पोर्क या कोई भी अन्य मीट खाने से यह वायरस कतई नहीं फैलता, क्योंकि इन्फ्लूएंजा वायरस 70 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर तुरंत निष्क्रिय हो जाता है। आज यह संक्रमण ठीक उसी तरह फैलता है जैसे आम मौसमी सर्दी-जुकाम या कोविड-19 फैलता है—यानी हवा में तैरती संक्रमित ड्रॉपलेट्स के जरिए।

इंसान से इंसान में कैसे फैलता है H1N1 संक्रमण?

जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता, छींकता या बात करता है, तो उसके मुंह और नाक से बारीक ड्रॉपलेट्स हवा में फैल जाती हैं। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति उस हवा में सांस लेता है, तो वायरस सीधे उसके फेफड़ों में प्रवेश कर जाता है। इसके अलावा, जब कोई मरीज खांसते समय अपने मुंह पर हाथ लगाता है और फिर दरवाजे के हैंडल, लिफ्ट के बटन, मेट्रो के पोल या मोबाइल फोन जैसी सतहों को छूता है, तो वहां वायरस कई घंटों तक सक्रिय रहता है। किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उसी सतह को छूकर अपने मुंह, आंख या नाक पर हाथ लगाने से यह संक्रमण तुरंत शरीर में दाखिल हो जाता है।

साधारण फ्लू और स्वाइन फ्लू के अंतर को कैसे पहचानें?

शुरुआती दौर में स्वाइन फ्लू के लक्षण आम वायरल बुखार जैसे ही लगते हैं, लेकिन यह बहुत तेजी से गंभीर रूप ले सकता है। स्वाइन फ्लू में अचानक 101 से 104 डिग्री फारेनहाइट तक बहुत तेज बुखार आता है, जिसके साथ मरीज को गंभीर कंपकंपी महसूस होती है। इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:

लगातार सूखी खांसी और गले में गंभीर खराश या दर्द, जिसके कारण कुछ भी निगलना मुश्किल हो जाता है। पूरे शरीर की मांसपेशियों में असहनीय दर्द, सिरदर्द और अत्यधिक कमजोरी व थकान होना। कई मरीजों, विशेषकर बच्चों में दस्त, उल्टी और पेट में मरोड़ जैसी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं भी देखी जाती हैं। सबसे खतरनाक संकेत है सीने में जकड़न, सांस लेने में तकलीफ और ऑक्सीजन स्तर का तेजी से नीचे गिरना। यदि किसी मरीज को सांस लेने में कठिनाई हो रही हो या होंठ व नाखून नीले पड़ने लगें, तो इसे आपातकालीन स्थिति मानकर तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए।

किन लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है यह संक्रमण?

स्वाइन फ्लू अधिकांश स्वस्थ वयस्कों में उचित आराम और दवाओं से 7 से 10 दिनों में ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ संवेदनशील श्रेणियों (High-Risk Groups) के लिए यह जानलेवा निमोनिया या एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (ARDS) का रूप ले सकता है। 5 साल से छोटे बच्चे और 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिससे उन पर वायरस का हमला गहरा होता है। इसके अलावा गर्भवती महिलाएं, अनियंत्रित डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, क्रॉनिक किडनी डिजीज या कैंसर से पीड़ित मरीजों में स्वाइन फ्लू फेफड़ों को सीधे डैमेज कर सकता है। ऐसे मरीजों को लक्षण दिखते ही बिना किसी देरी के डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

इलाज, बचाव और संक्रमण की रोकथाम का सही प्रोटोकॉल

स्वाइन फ्लू की पुष्टि आरटी-पीसीआर (RT-PCR) टेस्ट के जरिए की जाती है, जिसमें मरीज के गले और नाक का स्वाब लिया जाता है। यदि लक्षण शुरू होने के 48 घंटों के भीतर बीमारी की पहचान हो जाती है, तो डॉक्टर एंटीवायरल दवाएं (जैसे ओसेल्टामिविर/टैमीफ्लू) शुरू करते हैं, जो वायरस के प्रसार को रोक देती हैं। मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से एंटीबायोटिक्स या एस्पिरिन जैसी दवाएं कतई नहीं लेनी चाहिए।

बचाव के लिए भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाते समय ट्रिपल लेयर मास्क का प्रयोग करें। नियमित रूप से हाथों को साबुन-पानी से 20 सेकंड तक धोएं या अल्कोहल-बेस्ड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें। बिना हाथ धोए चेहरे, आंख और नाक को छूने से बचें। संक्रमण से खुद को सुरक्षित रखने के लिए हर साल अपडेटेड फ्लू वैक्सीन (Quadrivalent Influenza Vaccine) जरूर लगवाएं। यदि कोई व्यक्ति बीमार महसूस कर रहा है, तो वह खुद को घर में आइसोलेट कर ले ताकि परिवार और सहकर्मियों में यह संक्रमण न फैले।