क्या बच्चों को डांटने या समझाने से ठीक हो जाता है ADHD, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ
आज के भागदौड़ भरे दौर में जहां बच्चों से लेकर बड़ों तक की जीवनशैली तेजी से बदल रही है, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई ऐसे विकार सामने आ रहे हैं जिनके बारे में समाज में आज भी बहुत अधिक भ्रम और अज्ञानता बनी हुई है। ऐसा ही एक बेहद चर्चित और संवेदनशील न्यूरोलॉजिकल विकार अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर यानी ADHD है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में लोग अक्सर बच्चों की सामान्य शरारत या अनुशासनहीनता समझ बैठते हैं। हमारे समाज में एक बहुत बड़ी और खतरनाक गलतफहमी यह फैली हुई है कि अगर किसी बच्चे को बहुत ज्यादा डांटा-डपटे जाए, उसे कड़े अनुशासन में रखा जाए या फिर थोड़ी सख्ती बरती जाए, तो उसकी यह अति-सक्रियता और भूलने की आदत अपने आप ठीक हो जाएगी। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और जाने-माने डॉक्टरों ने इस धारणा को सिरे से खारिज करते हुए एक ऐसा सच उजागर किया है, जिसे हर माता-पिता और अभिभावक को जानना बेहद जरूरी है। डॉक्टरों का साफ तौर पर कहना है कि डांट-फटकार या सजा देने से न तो ADHD ठीक होता है और न ही इससे बच्चे के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में कोई सकारात्मक बदलाव आता है, बल्कि ऐसा करने से बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य और अधिक खराब हो सकता है।
क्या वास्तव में ADHD कोई बीमारी है या सिर्फ बच्चों की बदमाशी
अक्सर परिवारों में जब कोई बच्चा बहुत ज्यादा उछल-कूद करता है, एक जगह टिककर नहीं बैठ पाता, पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता या वह लगातार अपनी चीजें खोता रहता है, तो माता-पिता और शिक्षक उसे 'बिगाड़ैल' या 'सुस्त' मान लेते हैं। वे सोचते हैं कि बच्चा जानबूझकर ऐसी हरकतें कर रहा है और थोड़ी सी डांट या थप्पड़ से वह लाइन पर आ जाएगा। लेकिन बाल मनोवैज्ञानिकों और न्यूरोलॉजिस्ट्स का यह समझाना है कि ADHD किसी भी प्रकार की जिद, बदमाशी या खराब परवरिश का नतीजा बिल्कुल नहीं है। यह सीधे तौर पर मस्तिष्क के विकास और उसमें मौजूद न्यूरोट्रांसमीटर से जुड़ी एक न्यूरोबायोलॉजिकल स्थिति है। इसका मतलब यह है कि बच्चे का दिमाग उस तरीके से काम नहीं कर पाता जिस तरह से एक सामान्य बच्चे का दिमाग सूचनाओं को प्रोसेस करता है। ऐसे में जब माता-पिता या समाज के लोग उस बच्चे को बार-बार डांटते हैं, उसे सबके सामने जलील करते हैं या उसकी तुलना दूसरे होनहार बच्चों से करते हैं, तो बच्चे के कोमल मन पर बहुत गहरा और नकारात्मक असर पड़ता है। बच्चा धीरे-धीरे खुद को अयोग्य और कमतर समझने लगता है, जिससे उसके अंदर हीन भावना घर कर जाती है।
डांट-फटकार से स्थिति सुधरने के बजाय और अधिक क्यों बिगड़ जाती है
विशेषज्ञों का यह स्पष्ट मत है कि जब आप किसी ADHD से पीड़ित बच्चे को डांटते हैं, तो आप उसकी समस्या को और अधिक गंभीर बना रहे होते हैं। इस विकार से ग्रस्त बच्चों का अपने आवेग (Impulse) और भावनाओं पर बहुत कम नियंत्रण होता है। वे कई बार बिना सोचे-समझे काम कर बैठते हैं क्योंकि उनके मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आत्म-नियंत्रण और योजना बनाने के लिए जिम्मेदार होता है, वह अलग तरीके से काम कर रहा होता है। ऐसे में जब उन पर चिल्लाया जाता है या उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से दंडित किया जाता है, तो वे अत्यधिक तनाव और एंग्जायटी का शिकार हो जाते हैं। तनाव बढ़ने से उनका ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और अधिक क्षीण हो जाती है, जिससे उनका अकादमिक प्रदर्शन और सामाजिक व्यवहार दोनों और ज्यादा बिगड़ने लगते हैं। माता-पिता यह समझ नहीं पाते कि बच्चा जानबूझकर परेशान नहीं कर रहा, बल्कि उसका तंत्रिका तंत्र इस समय संघर्ष कर रहा है, और यही गलतफहमी परिवार में दूरियों की वजह बन जाती है।
एक्सपर्ट्स की सलाह: प्यार, धैर्य और सही मार्गदर्शन से कैसे करें स्थिति को हैंडल
इस स्थिति से निपटने के लिए एक्सपर्ट्स का यह सुझाव है कि माता-पिता को सबसे पहले इस डिसऑर्डर के वैज्ञानिक पहलुओं को समझना होगा। अगर आपके घर में या आसपास किसी बच्चे में ADHD के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो सबसे पहले किसी अच्छे बाल मनोचिकित्सक या काउंसलर से संपर्क करना चाहिए। बच्चे को डांटने के बजाय उसके साथ बहुत ही प्यार, संयम और धैर्य से पेश आने की जरूरत होती है। उसकी छोटी-छोटी सफलताओं की सराहना करें और उसे एक ऐसा संरचित माहौल दें जहाँ वह सहज महसूस कर सके। थेरेपी, बिहेवियरल मॉडिफिकेशंस और सकारात्मक प्रोत्साहन के जरिए इन बच्चों की कार्यकुशलता में अभूतपूर्व सुधार लाया जा सकता है। जब बच्चे को यह एहसास होता है कि उसके माता-पिता उसे समझ रहे हैं और उसकी स्थिति का सम्मान कर रहे हैं, तो उसका आत्मविश्वास स्वतः ही बढ़ने लगता है।
समाज की सोच बदलने की जरूरत, जागरूकता ही है सबसे बड़ा बचाव
अंत में यह समझना बेहद आवश्यक है कि ADHD जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल स्थितियों को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों को दूर किया जाए। यह कोई ऐसा दोष नहीं है जो किसी की डांट या अनुशासन से रातों-रात गायब हो जाए। इसके लिए सामाजिक संवेदनशीलता, समय पर सही मेडिकल मदद और एक सपोर्टिव माहौल की आवश्यकता होती है। स्कूलों में शिक्षकों को भी इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे ऐसे बच्चों को सजा देने के बजाय उनकी मनोवैज्ञानिक जरूरतों को समझें। यदि हम एक समाज के रूप में इन बच्चों को स्वीकार करना सीख जाएंगे और उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनाएंगे, तो वे भी अपनी अनूठी क्षमताओं के बल पर जीवन के हर क्षेत्र में असाधारण सफलता हासिल कर सकते हैं। इसलिए आज ही अपनी सोच को बदलिए, बच्चों पर चिल्लाना बंद कीजिए और उन्हें एक स्वस्थ व सकारात्मक जीवन जीने का अवसर दीजिए।