नाबालिग से रेप और हत्या के दोषी की पैरोल याचिका खारिज
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों के मामलों में एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए एक कुख्यात अपराधी की पैरोल याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में दो टूक कहा कि जेल में बंद अपराधी द्वारा अपनी बहन की देखभाल या पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देना कोई कानूनी रूप से आपातकालीन स्थिति नहीं है। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि पैरोल किसी दोषी का कोई मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है, बल्कि यह राज्य द्वारा दी जाने वाली एक ऐसी सुविधा है जिसका लाभ उठाने के लिए ठोस और वैध आधार होना अनिवार्य है। इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद से न्यायपालिका का यह सख्त रुख एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है, जिससे यह साफ हो गया है कि जघन्य मामलों में सजा काट रहे दोषियों को अदालतों से आसानी से राहत मिलने वाली नहीं है।
#1 क्या है पूरा मामला और क्यों मांगी गई थी पैरोल?
यह पूरा मामला हरियाणा के जींद (Jind) जिले से जुड़ा है, जहां कुछ साल पहले एक मासूम नाबालिग बालिका के साथ बेहद क्रूरतापूर्ण तरीके से दुष्कर्म (Rape) और उसके बाद निर्मम हत्या की गई थी। इस सनसनीखेज अपराध ने पूरे राज्य और देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट की लंबी सुनवाई और पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने आरोपी को इस अमानवीय जुर्म के लिए दोषी करार देते हुए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हाल ही में इस दोषी ने हरियाणा के जेल मैनुअल और नियमों का हवाला देते हुए पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका में उसने अपनी सगी बहन की देखभाल और पारिवारिक कार्यक्रमों का हवाला देते हुए 8 हफ्ते (दो महीने) की लंबी पैरोल की मांग की थी, ताकि वह जेल से बाहर आ सके।
#1 हाई कोर्ट की दो टूक: 'पैरोल कोई अधिकार नहीं, समाज की सुरक्षा सर्वोपरि'
मामले की सुनवाई करते हुए पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दोषी की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पैरोल या फर्लो (Furlough) का उद्देश्य कैदी को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना और उसके पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखना होता है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि हर अपराधी अपनी मर्जी से जब चाहे जेल से बाहर आ जाए। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि एक क्रूर बलात्कारी और हत्यारे की बहन की देखभाल जैसे सामान्य पारिवारिक कारणों को 'आपातकालीन स्थिति' (Emergency) नहीं माना जा सकता। यदि इस तरह के कुख्यात अपराधियों को केवल निजी कारणों से खुलेआम समाज में घूमने की छूट दे दी जाए, तो इससे न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठेंगे, बल्कि पीड़ित परिवार और समाज की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।
#1 बढ़ते अपराधों के बीच न्यायपालिका का सख्त रवैया और जनसुरक्षा संदेश
कानूनी जानकारों का मानना है कि पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला उन अपराधियों के लिए एक बड़ा सबक है जो अक्सर तकनीकी कमियों या छोटे-छोटे पारिवारिक बहानों का सहारा लेकर जेल से बाहर आने की फिराक में रहते हैं। हरियाणा और पंजाब के क्षेत्र में पिछले कुछ समय में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों को लेकर समाज में गहरा रोष देखने को मिला है। ऐसे संवेदनशील मामलों में अदालतों द्वारा नरमी न बरतना और कानून के दायरे में रहकर कठोर फैसले सुनाना न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास को और अधिक मजबूत करता है। हाई कोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बालिकाओं के साथ जघन्य अपराध करने वालों को किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी।
#1 जींद और हरियाणा में इस फैसले पर आम जनता और वकीलों की प्रतिक्रिया
जींद और आसपास के इलाकों में जैसे ही हाई कोर्ट के इस कड़े फैसले की खबर फैली, लोगों ने अदालत के इस कदम का जोरदार स्वागत किया। पीड़ित परिवार और स्थानीय नागरिकों का कहना था कि ऐसे अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना चाहिए, क्योंकि वे समाज में खुले घूमने के लायक नहीं हैं। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस प्रकार के न्यायिक दृष्टांत भविष्य में अन्य अदालतों के लिए भी एक मजबूत मिसाल बनेंगे। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक अधिकारों और मानवीय पहलुओं के नाम पर जघन्य अपराधियों को समाज की सुरक्षा खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।