हरियाणा में सफाई कर्मियों की हड़ताल पर फंसा बड़ा पेंच: ठेकेदारों ने पुराने कर्मचारियों को दोबारा काम पर रखने से किया साफ इनकार
हरियाणा राज्य के विभिन्न हिस्सों में इन दिनों सफाई व्यवस्था को लेकर एक नया और गंभीर संकट खड़ा हो गया है, जिससे आम जनता की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। पिछले कुछ दिनों से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरने और प्रदर्शन पर बैठे सफाई कर्मचारियों और प्रशासन के बीच समझौता होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन इस पूरे मामले में अब एक नया और बड़ा पेंच फंस गया है। हड़ताल समाप्त होने के बाद जब इन सफाई कर्मचारियों ने वापस अपने काम पर लौटने की कोशिश की, तो संबंधित निजी ठेकेदारों ने उन्हें ड्यूटी पर रखने से सीधे तौर पर इनकार कर दिया है। इस अड़ियल और मनमाने रवैये के बाद से कर्मचारियों में भारी आक्रोश फैल गया है और उन्होंने एक बार फिर से आंदोलन तेज करने की चेतावनी दे दी है। स्थानीय निकायों और नगर निगमों के अधीन कार्य करने वाले इन सफाई कर्मियों का कहना है कि यदि उन्हें उनका पुराना रोजगार और हक सम्मान के साथ वापस नहीं मिला, तो राज्यभर में एक बार फिर से कूड़े के ढेर लग सकते हैं और स्वच्छता अभियान पूरी तरह ठप हो सकता है।
हड़ताल खत्म होने के बाद कर्मचारियों के सामने खड़ी हुई नई मुसीबत
किसी भी श्रमिक आंदोलन या हड़ताल का मुख्य उद्देश्य अपनी जायज मांगों को मनवाना और काम पर सुरक्षित बने रहना होता है, लेकिन हरियाणा के इन सफाई कर्मियों के लिए हड़ताल के बाद की यह स्थिति किसी बड़े झटके से कम नहीं है। जब कर्मचारी संगठनों ने प्रशासन के साथ हुई लंबी बैठकों के बाद अपनी हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया था, तो उन्हें यह उम्मीद थी कि वे बिना किसी रुकावट के अपने पुराने कार्यस्थलों पर लौट सकेंगे। इसके विपरीत, जब वे अपने काम की जगह पर पहुंचे, तो ठेकेदारों और एजेंसियों ने प्रशासनिक आदेशों का हवाला देते हुए उन्हें ड्यूटी ज्वाइन कराने से मना कर दिया। ठेकेदारों का तर्क है कि हड़ताल की अवधि के दौरान उन्होंने काम चलाने के लिए नए वैकल्पिक कर्मचारियों या मजदूरों की व्यवस्था कर ली थी, जिसके कारण अब पुराने कर्मियों के लिए जगह खाली नहीं है। इस तरह के बहानेबाजी और गैर-जिम्मेदाराना रवैये ने कर्मचारियों के भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है, जिससे राज्य का पूरा प्रशासनिक तंत्र भी असमंजस की स्थिति में आ गया है।
ठेकेदारों की जिद और प्रशासनिक सुस्ती पर भड़के सफाई कर्मचारी संघ
सफाई कर्मचारी यूनियन के नेताओं ने ठेकेदारों के इस रुख को सरासर मनमानी और मजदूरों का शोषण करार देते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि जब सरकार और यूनियन के बीच यह सहमति बनी थी कि किसी भी कर्मचारी के साथ प्रतिशोध की भावना से कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी और सभी को उनके पदों पर बहाल किया जाएगा, तो फिर ठेकेदार किस नियम के तहत उन्हें रोक रहे हैं। कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि निजी ठेकेदार अपनी मनमानी और कम वेतन पर नए मजदूर रखकर अवैध मुनाफा कमाने के चक्कर में पुराने अनुभवी कर्मियों का हक छीनना चाहते हैं। इस मुद्दे को लेकर विभिन्न जिलों में यूनियन के कार्यकर्ताओं ने आपात बैठकें बुलानी शुरू कर दी हैं और स्थानीय प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मामले में हस्तक्षेप करके ठेकेदारों पर नकेल नहीं कसी गई, तो वे फिर से झाड़ू नीचे रखकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे।
आम नागरिकों की बढ़ी मुश्किलें और शहर की चरमराती सफाई व्यवस्था
सफाई कर्मियों और ठेकेदारों के बीच चल रहे इस रस्साकशी के खेल का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता और शहर के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। पिछले कुछ दिनों से चली आ रही हड़ताल के कारण पहले ही शहरी इलाकों की गलियों, बाजारों और रिहायशी क्षेत्रों में कचरे के अंबार लग चुके थे, और जब थोड़ी बहुत सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटने की उम्मीद बंधी थी, तो इस नए विवाद ने हालात को और अधिक बिगाड़ दिया है। सड़कों पर बिखरा कचरा, नालियों का गंदा पानी और दुर्गंध से परेशान लोग स्थानीय प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। यदि समय रहते इस विवाद का कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में किसी बड़ी महामारी या संक्रामक बीमारी के फैलने का खतरा भी तेजी से मंडराने लगेगा, जिससे शहर का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
समाधान की तलाश और सरकार की भूमिका पर टिकी सबकी नजरें
इस गंभीर गतिरोध के बीच अब सभी की निगाहें राज्य सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित स्थानीय निकाय के अधिकारियों पर टिकी हुई हैं कि वे इस समस्या का क्या समाधान निकालते हैं। जानकारों का मानना है कि निजीकरण और ठेकेदारी प्रथा के इन दुष्प्रभावों के कारण ही अक्सर मजदूरों और कर्मचारियों को इस तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करे और ठेकेदारों को यह स्पष्ट निर्देश दे कि वे किसी भी पुराने सफाई कर्मी को काम से न निकालें, बल्कि उनकी सेवा सुरक्षा को सुनिश्चित करें। स्वच्छता ही सेवा का ढिंढोरा पीटने वाले तंत्र को यह समझना होगा कि जब तक जमीन पर मेहनत करने वाले इन सफाई सैनिकों का सम्मान और रोजगार सुरक्षित नहीं रहेगा, तब तक किसी भी शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने का सपना साकार नहीं हो सकता है।