पेंशन के लिए 102 की उम्र में दुलीचंद ने निकाली थी बारात
हरियाणा के रोहतक जिले से ताल्लुक रखने वाले और अपनी अनोखी बगावत से पूरे देश का ध्यान खींचने वाले चर्चित बुजुर्ग बाबा दुलीचंद (Duli Chand) अब हमारे बीच नहीं रहे। 106 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। बाबा दुलीचंद वही शख्सियत थे जिन्होंने सरकारी कागजों में खुद को 'मृत' घोषित किए जाने के बाद पेंशन चालू कराने के लिए 102 साल की उम्र में सेहरा बांधकर, घोड़ी पर चढ़कर गाजे-बाजे के साथ अपनी ही अनोखी बगावत की 'बारात' निकाली थी। हाथों में "थारा फूफा अभी जिंदा है" का बैनर लेकर रोहतक की सड़कों पर निकला उनका वह काफिला भारतीय प्रशासनिक इतिहास की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विरोध रैलियों में दर्ज हो गया था। उनके निधन की खबर से पूरे हरियाणा में शोक की लहर दौड़ गई है, वहीं लोग उनके उस अदम्य साहस, जिंदादिली और व्यवस्था से लड़ने के अनूठे अंदाज को नमन कर रहे हैं।
#1 जब सरकारी सिस्टम ने कागजों में 'मार' दिया, तो दूल्हा बनकर निकाला था सरकारी भ्रष्टाचार का जुलूस
बाबा दुलीचंद की यह बहुचर्चित कहानी साल 2022 की है, जब हरियाणा सरकार के समाज कल्याण विभाग के कागजों और पेंशन पोर्टल पर लापरवाही के चलते उन्हें 'मृत' (Dead) दर्ज कर दिया गया था। इसके चलते उनकी वृद्धावस्था पेंशन अचानक रोक दी गई थी। जब बाबा दुलीचंद पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक गए और किसी भी अधिकारी ने उनकी बात नहीं सुनी कि वे जीवित हैं, तो उन्होंने किसी से गिड़गिड़ाने के बजाय एक ऐसा अनूठा रास्ता चुना जिसने तत्कालीन पूरी राज्य सरकार और प्रशासन की नींद उड़ा दी। 102 साल की उम्र में उन्होंने बाकायदा दूल्हे का जोड़ा पहना, सिर पर साफा बांधा, हाथ में नोटों की माला पहनी और ढोल-नगाड़ों के साथ रोहतक में तत्कालीन प्रशासनिक मुख्यालय तक अपनी ही बारात निकाल दी। इस बारात का नेतृत्व आम आदमी पार्टी के स्थानीय नेताओं और ग्रामीणों ने किया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर रातों-रात वायरल हो गया था।
#1 'थारा फूफा अभी जिंदा है': वो एक नारा जिसने हिला दी थी पूरी सरकार
अपनी इस अनोखी बारात के दौरान बाबा दुलीचंद जिस गाड़ी और बग्गी में सवार थे, उस पर एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था जिस पर लिखा था— "थारा फूफा अभी जिंदा है" (तुम्हारा फूफा अभी जीवित है)। इसके साथ ही उनके हाथ में तख्ती थी जिस पर लिखा था कि "6 महीने से पेंशन बंद है, कागजों में मुझे मार दिया गया है, लेकिन मैं जिंदा हूं!" इस अनोखे और व्यंग्यात्मक प्रदर्शन की गूंज सिर्फ हरियाणा ही नहीं बल्कि देश-विदेश के मीडिया में उठी थी। दबाव इतना बढ़ गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय और जिला प्रशासन को आनन-फानन में मामले का संज्ञान लेना पड़ा था। अधिकारियों को खुद बाबा दुलीचंद के घर जाकर उनका भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करना पड़ा और उनकी रुकी हुई पेंशन को ससम्मान बहाल करना पड़ा था। उनके इस एक कदम ने प्रदेश भर के हजारों उन बुजुर्गों को भी राहत दिलाई थी जिन्हें कागजी कमियों के कारण मृत बताकर पेंशन से वंचित कर दिया गया था।
#1 106 साल की उम्र में भी बरकरार थी जिंदादिली और बेबाक मिजाज
रोहतक के गांधरा गांव के रहने वाले बाबा दुलीचंद अपने गांव और आसपास के इलाके में अपनी बेबाक बयानबाजी, हरियाणवी ठेठ मिजाज और जिंदादिली के लिए जाने जाते थे। 106 साल की उम्र में भी उनकी आवाज में वही कड़कपन और आंखों में वही चमक थी। वे अक्सर युवाओं को संदेश देते थे कि अपने अधिकारों के लिए कभी किसी के आगे झुकना नहीं चाहिए और अगर सिस्टम गलत करे तो उसके खिलाफ आवाज उठाने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। उनके परिजनों और ग्रामीणों के अनुसार, बाबा दुलीचंद अंतिम समय तक अपने दैनिक कार्य स्वयं करते थे और उनका स्वास्थ्य सामान्य बना हुआ था। बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वाभाविक जटिलताओं के कारण उन्होंने अपने निवास स्थान पर शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली।
#1 हरियाणा के प्रशासनिक सुधारों में याद रखा जाएगा बाबा दुलीचंद का नाम
बाबा दुलीचंद का इस तरह जाना केवल एक बुजुर्ग का जाना नहीं है, बल्कि उस जुझारू प्रतीक का अंत है जिसने सरकारी नौकरशाही की आंखें खोलने का काम किया था। उनके इस ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन के बाद ही हरियाणा सरकार ने अपने 'परिवार पहचान पत्र' (PPP) और पेंशन सत्यापन पोर्टल में व्यापक सुधार किए थे ताकि किसी भी जीवित बुजुर्ग को कागजी त्रुटि के कारण मृत घोषित न किया जा सके। उनके निधन की खबर फैलते ही गांधरा गांव में हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। बाबा दुलीचंद का जीवन और उनका वह ऐतिहासिक "थारा फूफा अभी जिंदा है" का नारा आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज से बड़ी कोई ताकत नहीं होती।