नफरत की आग में जला गुरु का आशियाना ,बांग्लादेश में फिर कांप उठी इंसानियत
News India Live, Digital Desk: कभी शांत बैठकर सोचिएगा कि कैसा महसूस होता है जब आप अपने ही घर में, अपने ही मोहल्ले में बेगाने हो जाएं? जहां बचपन गुजरा हो, वहां अब रात को सोते वक्त खटका लगा रहता हो कि कहीं आज की रात आखिरी न हो। यह बातें पढ़कर शायद आपको कोई फिल्म की कहानी लगे, लेकिन सरहद पार हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में यह डरावनी हकीकत है। वहां अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं के लिए डर का यह माहौल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
ताजा मामला बहुत दुखद है और यह खबर आपको अंदर तक झकझोर देगी। बांग्लादेश के सिलहट से जो खबर आई है, उसने यह साबित कर दिया है कि दंगाइयों की नजर में अब एक 'शिक्षक' की भी कोई इज्जत नहीं बची है।
वो रात, जब सब कुछ राख हो गया
जरा उस परिवार की हालत सोचिए। गोवैनघाट उपजिला (Gowainghat Upazila) के रहने वाले बीरेंद्र कुमार डे, जिन्हें वहां के बच्चे और लोग प्यार से 'झुनु सर' बुलाते हैं, अपने घर में सो रहे थे। वह एक शिक्षक हैं एक ऐसा इंसान जिसने जिंदगी भर समाज को रोशनी दी। लेकिन बीती रात के अंधेरे में कुछ असामाजिक तत्वों ने उनके घर को ही आग के हवाले कर दिया।
गनीमत यह रही कि झुनु सर और उनका परिवार किसी तरह आग की लपटों के बीच से निकलकर जान बचाने में कामयाब रहा। लेकिन वो घर, जिसे उन्होंने खून-पसीने की कमाई से बनाया था, वो उनकी आंखों के सामने धू-धू कर जल गया। सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं जले, उस आग में वो 'सुरक्षा का भरोसा' भी जल गया जो हर नागरिक का हक होता है।
सवाल सिस्टम पर: आखिर कब तक सहेगा अल्पसंख्यक समाज?
बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से (खासकर सियासी बदलावों के बाद) जो हालात बने हैं, वो चिंताजनक हैं। कभी दुर्गा पूजा के दौरान मंदिरों पर हमले होते हैं, तो कभी मामूली बात पर किसी हिंदू को निशाना बना लिया जाता है।
लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार (Atrocities on Hindus in Bangladesh) अब आम बात होती जा रही है। बीरेंद्र कुमार डे जैसे शिक्षक, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं, जिनका काम सिर्फ बच्चों को पढ़ाना है, अगर वो सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी का क्या होगा?
वहां के स्थानीय लोगों में इस घटना के बाद से गहरा गुस्सा है, लेकिन उससे ज्यादा 'डर' है। पुलिस आती है, जांच की बात कहती है, लेकिन अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? क्यों उन्हें कानून का खौफ नहीं है?
सोशल मीडिया का शोर और जमीनी हकीकत
हम और आप यहां बैठकर शायद सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख सकते हैं, लेकिन उस दर्द को महसूस करना मुश्किल है जब आपका सबकुछ छीन लिया जाए सिर्फ आपकी 'पहचान' की वजह से। यह घटना सिर्फ एक मकान जलने की नहीं है, यह एक चेतावनी है कि नफरत अब किस स्तर तक गिर चुकी है।
आज 'झुनु सर' का घर जला है, कल किसी और का नंबर हो सकता है। दुनिया भर में लोग Human Rights in Bangladesh की बात करते हैं, लेकिन जब तक ऐसे अपराधियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक अल्पसंख्यक समाज सुकून की नींद नहीं सो पाएगा।
हैरानी की बात यह है कि पड़ोसी होने के नाते हम अक्सर इन खबरों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन ये सुलगते हुए सवाल हैं। एक सभ्य समाज में आगजनी और हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, चाहे वो किसी भी धर्म के खिलाफ हो। उम्मीद है कि बांग्लादेश प्रशासन जागेगा और पीड़ित परिवार को न सिर्फ मुआवजा मिलेगा, बल्कि इन्साफ भी।