बरेली के गुरुजी ने पेश किया साइकिल मॉडल, अपनी सैलरी से बच्चों को बांट दीं साइकिलें, तीन गुना बढ़ी अटेंडेंस
News India Live, Digital Desk: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में गिरती छात्र उपस्थिति (Student Attendance) अक्सर प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनी रहती है। लेकिन बरेली के एक शिक्षक ने इस समस्या का ऐसा 'जादुई' समाधान निकाला है, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रदेश में हो रही है। भदपुरा ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय नवादा इमामाबाद के शिक्षक डॉ. लक्ष्मीकांत शुक्ला ने 'रोज स्कूल आएं-साइकिल पाएं' अभियान शुरू कर न केवल बच्चों के हाथों में किताबें थमाईं, बल्कि उनके सपनों को साइकिल के पहियों पर सवार कर दिया।
वेतन से खरीदी खुशियां: 100% हाजिरी पर मिला 'महा-उपहार'
डॉ. लक्ष्मीकांत शुक्ला ने शिक्षा के प्रति बच्चों को आकर्षित करने के लिए एक अनोखी शर्त रखी थी। सत्र 2025-26 के दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि जो छात्र पूरे साल बिना एक भी छुट्टी किए स्कूल आएगा, उसे साइकिल इनाम में दी जाएगी। नतीजा यह हुआ कि 14 छात्र-छात्राएं ऐसे निकले जिन्होंने पूरे साल एक भी दिन स्कूल मिस नहीं किया। वादे के मुताबिक, डॉ. शुक्ला ने अपने निजी वेतन से इन सभी होनहारों को नई साइकिलें भेंट कीं। सोशल मीडिया पर इन बच्चों की मुस्कुराती तस्वीरें अब वायरल हो रही हैं।
तीन साल में 80 से 225 तक पहुंचा आंकड़ा
शिक्षक के इस व्यक्तिगत प्रयास का असर स्कूल के आंकड़ों पर साफ दिख रहा है। डॉ. शुक्ला बताते हैं कि तीन साल पहले तक इस स्कूल में महज 80 बच्चे नामांकित थे, लेकिन उनके नवाचारों के बाद यह संख्या बढ़कर 225 पहुंच गई है। जो बच्चे पहले मुश्किल से 50 फीसदी दिन स्कूल आते थे, उनकी उपस्थिति अब 80 प्रतिशत से अधिक दर्ज की जा रही है। घर-घर जाकर अभिभावकों से संवाद करना और उन्हें शिक्षा का महत्व समझाना इस सफलता की बड़ी कड़ी रही है।
हाईटेक पढ़ाई: 'रीड अलांग' ऐप और 28 लाख स्टार्स का कमाल
सिर्फ साइकिल ही नहीं, डॉ. शुक्ला ने पढ़ाई को तकनीक से जोड़कर इसे बेहद रोचक बना दिया है। उन्होंने स्कूल में 'रीड अलांग' (Read Along) ऐप का इस्तेमाल शुरू किया, जिससे बच्चों की पढ़ने की क्षमता में जबरदस्त सुधार हुआ है। ऐप पर बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले बच्चों को भी पुरस्कृत किया जाता है। इसी का परिणाम है कि कक्षा 5 की एक छात्रा ने ऐप पर 28 लाख स्टार्स हासिल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। निपुण भारत मिशन के तहत यहां के बच्चे गणित और भाषा में भी प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं।
कड़ाके की ठंड में जैकेट और रसोइयों का सम्मान
यह पहली बार नहीं है जब डॉ. लक्ष्मीकांत शुक्ला ने अपनी दरियादिली दिखाई हो। इससे पहले कड़ाके की सर्दियों में उन्होंने अपने वेतन से 100 छात्रों को जैकेट वितरित की थीं। उन्होंने न केवल बच्चों का ख्याल रखा, बल्कि स्कूल के रसोइयों और अन्य स्टाफ को भी जैकेट देकर संवेदनशीलता का परिचय दिया। समय-समय पर वे समाज के सफल लोगों को स्कूल बुलाकर बच्चों का मार्गदर्शन भी कराते हैं, ताकि वे बड़े होकर देश का नाम रोशन कर सकें।